Monday, September 8, 2008

दहेज

स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी आज हम वस्तविक रूप से सभ्य नही हो पाये हैं फिर भी स्वयं को सभ्य कहतेहुए हमें कोई शर्म नही आती ।दहेज आज भी एक दानव के समान हामरे बीच व्याप्त है। केवल वह अस्तित्व में हीहै अपितु दिन-प्रतिदिन वह पुष्ट होता जा रहा है उसकी बेल दिन दूना रात चौगुना बढ़ रही है सच है पर थोड़ाकड़वा है वैसे सच का स्वभाव होता है कड़वा होना आज का धनी वर्ग सबसे अधिक दहेज लोभी है उसने दहेज कानाम परिवएतन अवश्य किया है पर माल वही है कुल मिलाकर बात वही है नई बोतल में पुरानी शराब ये प्रथादिन प्रतिदिन और भयावह होती जा रही है आज दहेज के कारण कितनी निर्मलाओं की अधिक उम्र के लड़के सेशादी कर दी जा रही है इसका कोई रेकार्ड सरकार के पास कभी रहा है रहेगा भी आखिर ऎसा रेकार्ड रहेगाकैसे इस पर तो समाज के तथाकथित दिग्गजों दूसरे शब्दों मे बड़े लोगों का पहरा होता है ऎसे में क्या माज़ाल कीसरकारी नासिका को इसकी सुगन्ध लग जाय मामला जब धन के लेनी देनी का हो तब तो सरकारी नाक को पानीमें भिगो-भिगोकर ज़ुकाम कराया जाता है ताकि उसे उसकी नाक के तले की गन्ध का भी पता तक चले भविष्यमें कोई मामला उठने पर वह मेडिकल सर्टिफिकेट दिखा सके की उसे ज़ुकाम था कै बार ऎसे मेंतो मेढकियों तकको ज़ुकाम होते देखा गया है। चाहे क्यों यह समाज के लिये अज़ूबा हो पर ऎसे अवसरों पर मेढकी को भी ज़ुकामहो सकता है आखिर आम भी तो इमली हो सकता है मोटी रकम हथियानी है किसी शिकार को फँसाकर अन्यथापत्नी बच्चों के पाँच सितारा होटलों में खाने, पार्टियों में जाने के शौक कैसे पूरे होंगे?
ये शौक तो पूरे करने ही हैं चाहे कितनी ही निर्मलाओं की मौत हो चाहे कितने ही प्रेमचन्द उनकी व्यथा -कथा लिखेपर ये शौक तो सबसे आगे है उससे सरकारी नाक को कोई सरोकार नही वह प्रेमचन्द को पड़कर द्रवित नही होसकती वो बातें तो आउटडेटेड हैं उसको तो जुकाम कराकर आपना काम निकालना है तभी तो वह समाज मेंसफल माना जायेगा ।इस दहेज की समस्या की अनदेखी बड़े लोगों की नाक भी हमेशा करती है क्योंकि इसमेपड़कर उसकी "प्रतिष्ठा" धूमिल हो जाय।