Saturday, September 20, 2008

स्त्री-पुरुष अनुपात में असंतुलन



में आजकल कन्या भ्रूण हत्याओं के कारण लगातार लड़कियों की संख्या में कमी हो रही है यह चिन्ताजनक है क्योंकि लड़्कियों के विना समाज चल सकता है क्या? स्त्री और पुरुष किसी समाज के आधारभूत और अनिवार्यघटक हैं पर हमारे यहाँ आजकल इस सर्वमान्य तथ्य को नज़र अन्दाज़ करके लड़कियों को अनावश्यक तत्त्वसमझा जाने लगा है इसी का परिणाम है कि आज हमारी सरकार यहाँ काम कर रहे एनजीओ सभी इस विषय मेंचिन्तित हैं चिन्ता इस सन्दर्भ को लेकर भी है कि यदि स्त्री-पुरुष अनुपात में बहुत बड़ा अन्तर हुआ तो समाज मेंस्त्रियाँ सर्वथा असुरक्षित हो जायेंगी तथा पर्दा-प्रथा जैसी कुरीतियाँ फिर से जन्म लेने लगेगीं ।कोई भी कुरीतिविषमता में ही जन्म लेती है स्त्रियों की कम संख्या एक प्रकार की विषमता ही है समाज में इस प्रवृत्ति के यदितह में हम जायें तो देखेंगे कि इसका मूल कारण दहेज-प्रथा है माता-पिता कभी यह नहीं चाहते कि उनकी पुत्रीको उसके अनुरूप घर-वर मिले और इसके लिये वे भरसक प्रयत्न करते हैं पर उनके इस प्रयत्न में दहेज एकबहुत बड़ा अवरोधक बनकर खड़ा हो जाता है और अन्ततः अनेक माता-पिता को अपनी पुत्री को उससे कहींअयोग्य व्यक्ति को ब्याहना पड़ता है जिससे उनका हृदय रो पड़ता है उस समय उनके पास अपनी विवशता परआँसू बहाने के सिवा कुछ नहीं रहता। उस मनोभूमि में मात्र वह यही सोंच सकते हैं कि काश! मेरे बेटी ही होती तोआज मुझे ये दुर्दिन देखना पड़ता कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला" की कविता "सरोजस्मृति " इसका एकसशक्त उदाहरण है जिसमें वे अपनी व्यथा-कथा स्वयं कह उठते हैं आज स्वतन्त्रता के छः दशक बाद भी स्थितिमें कुछ सुधार नही हुआ है बल्कि स्थिति बद् से बदतर हो गयी है समाज में आज दहेज के लोभियों की गिनतीनही की जा सकती स्थिति यह है कि कुछ लोग जो बाहर से स्वयं को दहेज विरोधी दिखाते हैं वही लोग जबअपने पुत्र का विवाह करते हैं तब उसके जन्म से लेकर विवाह के दस वर्ष बाद तक का उसके ऊपर लगने वाला पूराखर्चा वसूल लेते हैं बात वही होती है बस अपनी पटुता से वे दूसरी तरह कहकर लड़की के पिता को निचोड़ने काभरसक प्रयत्न करते हैं बात यहीं नहीं समाप्त हो जाती विवाह के बाद बच्चे भी हो जाने तक उनकी दहेज की माँगबन्द नही होती उसके लिये वे पुत्रवधू को अमानवीय प्रताड़नाएं भी देने से नहीं चूकते जिसके चलते आज असंख्यबेटियाँ या तो ससुराल वालों के द्वार जबरदस्ती मौत की गोद में सुला दी जाती हैं अथवा इन सब से ऊबकर स्वयंमौत का रास्ता चुन लेती हैं और माता-पिता को जीवन भर अपनी विवशता पर आँसू बहाने को छोड़ जाती हैं।आश्चर्य की बात यह है कि इस कार्य में आगे रहने वालों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं अधिक है बहुओं कोप्रताड़ित करने के जितने मामले आयेदिन समाचार-पत्रों में आते रहते हैं उनमें महिलाओं द्वारा प्रताड़ना काप्रतिशत अधिक रहता है यह और भी चिन्ताजनक बात है ।इन्ही सब के चलते आज भारतीय समाज में ऐसेलोगों की संख्या अधिक हो गयी है जो बेटियाँ नहीं चाहते क्योंकि जन्म देकर उनको जीवन भर घुट-घुट कर जीतादेखने से अच्छा है कि उनका जन्म ही हो परन्तु यह प्रवृत्ति आदर्श समाज के लिये बहुत घातक है इससेभरतीय समाज में वे कुरीतियाँ पुनः व्याप्त हो जायेंगी जिनको मिटाने के लिये अनेक सुधार आन्दोलन चलाये गये इस प्रवृत्ति को रोकने का एकमात्र उपाय यही है कि समाज से इस दहेज प्रथा का समूलोच्छेद किया जाय इसी एककार्य से समस्त कार्य सिद्ध हो जायेंगे समाज में स्त्रियों को उनका सम्मान मिलने लगेगा तथा समाज में तद्विषयककुरीतियाँ भी घर नहीं करने पायेंगी अतः आज व्यक्ति, समाज, सरकार स्वयंसेवी संगठनों को इस विषय मेंजागरूक होंने तथा ठोस कारगर कदम उठाने की आवश्यकता है ताकि भविष्य के संकट से बचा जा सके

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