Monday, March 26, 2018

नमन महादेवी

नमन महादेवी
------------------
आज हिन्दी की प्रखर कवयित्री एवं छायावाद के प्रमुख स्तम्भों में से एक महादेवी वर्मा जी का जन्मदिन है। महादेवी वर्मा मात्र महिला-लेखन ही नहीं अपितु महिला-गौरव की प्रतिनिधि हैं। महादेवी उस भारतीय मातृत्व दृष्टि एवं दर्शन की प्रतिनिधि हैं जो मात्र जननी और प्रसूता को ही माता नहीं मानता अपितु हर उस अधिष्ठान में मातृभाव देखता है जिसमें करुणा, ममता और वात्सल्य है। महादेवी एक क्रांति हैं, एक चिन्गारी हैं जिनके माध्यम से महिलाओं की परम्परागत सर्जक भूमिका से इतर सर्जनाओं की अन्य भूमिकायें भी विधिवत् उद्घाटित हुयी हैं। महादेवी का जीवन संघर्ष इस बात का उदाहरण है कि ठोकर और तिरस्कार झेलकर और चुनौती स्वीकार कर यदि आगे बढ़ा जाये तो कुछ भी असम्भव नहीं है। ठोकर खाकर आगे बढ़ना एक क्रांति है। उस क्रांतिपथ पर महादेवी चलीं और स्वयं को प्रकाशित करते हुये उन्होंने अनेक नीरव जीवन में द्युति, कान्ति एवं आशा का संचार किया। काली रात को उन्होंने प्रातः की पूर्व घड़ी सा मानकर स्वयं को प्रखर बनाते हुये, आत्मपरिमार्जन करते हुये सूर्य का दर्शन किया। महादेवी की संकल्प के प्रति दृढ़ता इतिहास के किसी भी अटल निर्णय से कम नहीं है। उनकी इस दृढ़ता ने रचनाओं का द्वार खोला, समन्वय की नवीन दृष्टि दी। महादेवी का जीवन ब्रह्मवादिनी का जीवन था, तपस्विनी का जीवन था, साक्षात् सरस्वती-साधिका का जीवन था। वह जीवनमुक्त का जीवन था। रचनाओं के क्रम में उनका जीवन विगलितवेद्यान्तरसंपर्कशून्य का जीवन था। महादेवी की रचना दृष्टि और सर्जना-साधना में एकाग्रता लिंगबोध, देश-काल-परिस्थिति बोध से मुक्त  सच्चिदानंद साधना थी।
 महादेवी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि परम्परागत नियमों, बंधनों और आरोपित सामाजिक बोधों, कतिपय अवरोधों से इतर एक महिला का जीवन कितना सर्जक हो सकता है, समाज को कितना दे सकता है? 
जब-जब महादेवी के जीवन-संघर्ष को पढ़ा तो लगा अन्याय हुआ उनके साथ। परन्तु जब - जब उनकी रचनाओं को पढ़ा, उनकी सर्जना के बिम्बों को देखा तब-तब लगा कि न्याय ही हुआ। अन्यथा प्रतिभा का यह परिष्कार, दृष्टि का यह निखार, दर्शन का यह विस्तार कैसे संभव होता और पीढ़ियाँ उससे उपकृत कैसे होतीं।
महादेवी का जीवन सामाजिक खाँचों में परिस्थितिवश डाली गयी और पुनः उससे ठेलकर, धक्का देकर निकाली गयी एक महिला का जीवन है। महादेवी का जीवन एक समाज सुधारिका का जीवन है जिसका मार्ग उनके जीवन से प्रारंभ होता है और फिर समाज तक जाता है। पीढ़ियों में सम्बंधों का कुछ बोध भरता है। महादेवी ने स्वयं को अकिञ्चन् मानते हुये समाज के यज्ञ में यत्किंचित् आहुति का प्रयास किया। उनका जीवन स्वस्ति हेतु स्वाहा का जीवन है। ज्योति हेतु स्नेह का जीवन है। उनके जीवन में एक दृढ़ता है, एक गतिशील स्थिरता है। एक कुम्भकार सी तनिक ताड़ना के साथ कुम्भकार के शिल्प सी समाज और सामाजिक मूल्यों से अपनापा है। संस्कार और सुधार की होड़ में वे विखंडन और भ्रंश की पक्षधर कभी नहीं हैं अपितु थोड़े सँवार और प्यार के साथ वे सुधार की शिल्पी हैं।
महादेवी का जीवन महिला-संसार की परिधि का विस्तार है। उनका जीवन महिलाओं के एकांगी परिधीय जीवन को एक विस्तृत दृष्टि देता है। परिधि के बाहर झाँकने और वहाँ कुछ रचने का मार्ग प्रशस्त करता है। अनेक आलोचक कहते हैं कि वे 'व्यंजना करते व्यंजित हो जाती हैं'। तो व्यंजित होने में बुराई क्या है? बशर्ते व्यंजना खोखले बिम्बों पर, मनगढ़ंत आदर्शों पर न टिकी हो। यदि सच्ची व्यंजना है तो हर मन का अनुरंजन होगा ही। ये अनुरंजन-शक्ति महादेवी की कविताओं, कहानियों, रेखाचित्रों और संस्मरणों में दिखायी पड़ती है। एक धारा फूट पड़ती है जिसमें मन रम जाता है, बह जाता है। लगता है कि गिल्लू हर आँगन में साक्षात् है और 'जाग तुझको दूर जाना' से सोता मन जाग जाता है और मोह के बन्धनों की पहचान करने लगता है। उनकी कालजयी पंक्तियाँ 'मैं नीर भरी दुःख की बदली, उमड़ी कल थी मिट आज चली' - शाश्वत सृष्टि चक्र की परिचायिका हैं, उपनिषदों की ज्ञानराशि का निचोड़ हैं। उनकी रचनाओं को पढ़ने से सृसेक्षा बलवती होती है। एक शक्ति जाग्रत होती है। महादेवी की कृतियों में अपूर्व जिजीविषा है। यह एक महिला की जिजीविषा है। यह उस अधिष्ठान की जिजीविषा है, जिसपर सबका जीवन टिका है। वह अधिष्ठान जिसे सबने सदा मूक ही देखा है, जब मुखर होता है तो क्या कर सकता है? समाज को क्या दे सकता है - इसका परिचायक महादेवी का जीवन है। श्रद्धांजलि महादेवी। तुम सच में 'महादेवी' हो-सबको चमकाने वाली, सबको प्रकाशित करने वाली। अंधकार की पोटली सहस्रसूर्यज्वाला से जलाने वाली।
@ममतात्रिपाठी

Sunday, March 25, 2018

सहदेईया/सहदईया/सहदेई/सहदेवी /Vernonia cinerea

साभार :Google 
हमारे आसपास बहुत से औषधीय पौधे हैं, जिनका परम्परागत रूप से रोग-व्याधि-चिकित्सा में हम उपयोग करते आये हैं। इनके चमत्कारिक प्रभाव को भी हम जानते हैं। इन पौधों और वनस्पतियों का आयुर्वेद में वर्णन भी प्राप्त होता है।
ऐसा ही एक औषधीय पौधा है 'सहदेईया/सहदेवी'। यह उस भूमि पर जो अपेक्षाकृत आसपास की भूमि से क्षारीय होती है, पसरा हुआ होता है। यह भूमि को आवृत्त किये रहता है। घास के मैदान को दूर से देखने पर यह पौधा घास के समान ही फैला दिखायी पड़ता है। परन्तु पास आने पर पता चलता है कि यह घास जैसा तोहै पर दूर्वा अर्थात् दूब से भिन्न है। यह मैदान के जिस भाग में पाया जाता है वहाँ आसपास कुछ क्षारीय 'रेह' जैसी सफेद भूमि अवश्य दिख जाती है। इसकी दो प्रजातियाँ प्रमुख रूप से पायी जाती हैं। जिन्हें पुष्प के आधार पर अलग किया जाता है। एक सफेद पुष्प वाली और दूसरी बैंगनी पुष्प वाली। बैंगनी फूलों वाली प्रजाति सहजता से उपलब्ध है। और खोजने पर आसानी से मिल जाती है। वैसे तो स्थान मिलने पर सहदेवी भूमि पर ही चिपकी रहती है परन्तु कभी-कभी इसके पौधे एक फुट तक लम्बाई भी ग्रहण करते हैं।
साभार:Google 
अन्य अनेक औषधीय पौधों की तरह ही यह भी एक ऐसा औषधीय पौधा है जो प्रायः परित्यक्त, उपेक्षित स्थानों पर, खंडहरों में, कोनों में उगता है। यह उस स्थान पर भी नहीं उगता जहाँ खाद-पानी का पर्याप्त पोषण मिले। यह सूखे और अनुपजाऊ भूमि पर उगता है। और उस भूमि को अपने फूलों से भर देता है। अनेक बार इसकी उपस्थिति भी हमारी नजरो में दर्ज नहीं हो पाती। हमें इसकी सुधि तब होती है जब कोई वैद्य या ओषधि का जानकार व्यक्ति किसीप्रकार की अस्वस्थता में इसके सेवन की सलाह देता है तथा विश्वासपूर्वक इसके अनुभूत सफल प्रयोगों को बताता है।
जैसे-जैसे जंगल और बाग-बगीचे सिमट रहे हैं। ऐसे वनस्पतियों और पौधों का आधार-संसार भी सिमट रहा है। क्योंकि ये अपेक्षा में नहीं उपेक्षा में जीने के अभ्यस्त हैं। ये ऐसे पौधे हैं जिन्हें आँख की पुतली जैसा संरक्षण नहीं चाहिये। अति संरक्षण में ये पलायन कर जाते हैं, सूख जाते हैं। ये ऐसे पौधे हैं जो दम्भी मानव को यह स्मरण करवाते हैं कि हम निरापद होकर जीने वाले हैं। सभी को संरक्षण के संकुचन में जीवित नहीं रखा जा सकता। हमारी पृथक् संरक्षा-प्रणाली है और उस प्रणाली में हमें, कोई कितना भी हितैषी क्यों न हो, किसी का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं। हमारा गुण गमलों में सुरक्षित नहीं रह सकता, वह चटक धूप, खारेपन और एकाकी अवस्था में निखरता है।
सहदेवी को हमारे यहाँ 'सहदेईया' कहते हैं। अवधी में सहदेईया या सहदइया उच्चारण मुँहसुख भी है क्योंकि इससे बोली का प्रवाह बना रहता है। तन्त्रशास्त्र में सहदेवी को विशेष स्थान प्राप्त है क्योंकि इससे अनेक तान्त्रिक क्रियाएं सिद्ध होती हैं। परन्तु तान्त्रिक पक्ष में न मेरी कोई गति है न वह यहाँ प्रासंगिक है और न उसे उद्घाटित करना मेरे लेखन का उद्देश्य है। अस्तु, हम यहाँ सहदेईया के लोकपक्ष जो ओषधि से जुड़ा है, के सन्दर्भ में बात करेंगे। हमने यह तो सुना ही होगा कि किसी पौधे का पञ्चांग-मूल, फल, फूल, पत्ती एवं तना ओषधीय उपयोग में आता है। सहदेईया के संदर्भ में भी ऐसा ही है। इसका पञ्चाङ्ग औषधि है। यह पाचन-संस्थान को सुदृढ़ करता है। हम सभी जानते हैं कि ज्वर और त्वचा रोग सीधे हमारे लीवर से, पाचन संस्थान से सम्बंधित है। ऐसे में सहदेईया लीवर को ठीक करके पाचन संस्थान को मजबूत करके, लम्बे समय से हो रहे ज्वर को ठीक करती है। इसका परम्परागत लोक-चिकित्सा में अब भी प्रयोग होता है। त्वचा विकारों में भी सहदेईया की जड़ को गाय के कच्चे दूध में पीसकर प्रातः काल खाली पेट एक माह तक पीने से एक्जिमा जैसे गम्भीर त्वचा विकार भी दूर हो जाते हैं। चाहें तो पंचाग भी पी सकते हैं। ये दोनों आज भी प्रयुक्त होंने वाले अनुभूत प्रयोग हैं।
आज ऐसी औषधियों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती इनका स्वेच्छा से उगना है। इनके उगने के लिए मिलने वाली भूमि का धीरे-धीरे अभाव होता जा रहा है। इस अभाव के साथ ही बाग-बगीचे में इनकी सहज उपलब्धता भी कम होती जा रही है। कम उपलब्धता तथा चिकित्सा की आधुनिक पद्धति जिसमें तनिक जुकाम में भी एंटीबायोटिक की ओर दौड़ना आम है, के कारण आजकल लोग ऐसी औषधियों की पहचान भी नहीं कर पाते। आयुर्वेद और परम्परागत औषधियों के प्रति वह श्रद्धा और विश्वास भी नहीं है। हालांकि पुनर्जागरण हो रहा है। परन्तु पुनर्जाग्रत होने तक हम बहुत बड़ा और मूल्यवान ज्ञान विस्मृत कर चुके होंगे।
सहदेईया, गूमा, भँघरा, शिवलिंगी आदि पौधों को देखते हुये हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि सबकुछ हम क्यारी बनाकर, ग्रीन हाउस में उगाकर, खेत में बोकर नहीं संरक्षित कर सकते। कुछ पौधे प्रकृति के संरक्षणशाला में ही सुरक्षित होते हैं। मानव-संरक्षण से उनका दम घुट जाता है, स्वभाव बदल जाता है, आत्मा उड़ जाती है। अतः प्रकृति की संरक्षणशालाओं को हम हजम न कर जायें। किसी न्यायालय में या राजस्व विभाग में इन पौधों और वनस्पतियों की खतौनी नहीं होती। ये भूमि का खरीद-फरोख्त नहीं करते... परन्तु ये भूमि के नैसर्गिक उत्तराधिकारी हैं।
अपने अधिकारों की धुन में
हम उनका अधिकार न छीने।
अपने तिलिस्मी इन्द्रधनुष देकर
उनका इन्द्रधनुषी संसार न छीने।।
ध्यान रहे हमारे पूर्वजों ने ऐसी औषधियों को देवी माना है। उनमें तेज है, द्युति है, चमक है। अपने साथ-साथ वो दूसरों को दीप्त करने का सामर्थ्य भी रखती हैं।

Saturday, March 24, 2018

कुआँ

समय था जब जलस्रोत विशेषकर अपना कुआँ किसी परिवार की आर्थिक - सामाजिक स्थिति का परिचायक हुआ करता था। कुआँ की खोदाई करवाना बहुत पुण्य का काम माना जाता था। इस कार्य में सामाजिक सहयोग अपरिहार्य था। जिस प्रकार मंदिर के निर्माण में सामाजिक सहयोग अपरिहार्य होता है। आप कितने भी सम्पन्न हो परन्तु समाज के अन्य लोगों से मंदिर-निर्माण, कूप-खनन में सहायता लेना आवश्यक है। इसका सीधा कारण सामाजिकता को बनाये रखना है। इस प्रकार की व्यवस्था से निर्माण करवाने वाले व्यक्ति में निर्माता का दम्भ नहीं आता।
आज कुआँ अप्रासंगिक हो गया है। लोग या तो उसकी पटाई करवा रहे हैं या उसे ढँक रहे हैं। एक समय था जब कुआँ खोदा जाना एक बड़ा अनुष्ठान था। इस अवसर पर गीत गाये जाते थे। उन क्षेत्रों में जो परम्परागत रूप से अपेक्षाकृत शुष्क हैं, कुएं की खोदाई और उसमें जल का प्रवाह पूरे समाज के आनन्द और उत्सुकता का विषय होता था।
कुआँ हमारे जीवन का अभिन्न अंग था इसीलिए उससे जुड़ी परम्पराओं और प्रक्रियाओं का आज भी निर्वाह होता है। कोई भी बेटी कुआँ की दूब के विना विदा नहीं होती। आज भी दूब के बहाने ही सही कुयें का ध्यान आता है। कुआँ पूजन आदि परम्पराएं भी कुयें के साथ हमारे प्रगाढ़ सम्बन्ध की परिचायक हैं।
 हमारे यहाँ अवध में विवाह के अवसर पर जब वर विवाह करने के लिए प्रस्थान करता है उससे पूर्व उसे सभी देवी - देवताओं, कुल-देवता, ग्राम-देवता सभी के स्थानों पर जाकर प्रणाम करना होता है। इसी क्रम में उसे एक कुयें की परिक्रमा भी करनी होती है सम्पूर्ण वर वेष धारण करके। मेरे मन में सदा यह जिज्ञासा उठती थी कि गाँव में इतने कुयें होने के बाद भी सभी एक ही कुयें की परिक्रमा क्यों करते हैं? अनेक लोगों से इस संदर्भ में पूछा पर कोई संतोषजनक उत्तर नहीं प्राप्त हुआ। एक दिन पिताजी से कुछ परम्पराओं पर चर्चा हो रही थी, उसी क्रम में यह प्रश्न उपस्थित हुआ। उन्होंने बताया कि सभी एक ही कुयें की परिक्रमा इसलिये करते हैं क्योंकि उस कुयें का बगिया के साथ विधिवत् विवाह-संस्कार करवाया गया था। उस कुयें के जल से उसके पास स्थित आम की बाग का सिंचन होता था। परम्परा के अनुसार आम के बाग का कुयें से विवाह करवाया जाता था। जिसमें एक पुत्री के विवाह जैसा बड़ा आयोजन किया जाता था। उस कुयें का भी बगिया से विवाह हुआ था इसलिए उसी की सभी शुभ होंने के कारण परिक्रमा करते हैं।
यदि हम इस बात का विश्लेषण करें तो पायेंगे कि हमारी परम्परायें किस प्रकार प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीना हमें सिखाती हैं।
आज विभिन्न यंत्रों की सहायता से जल का शोषण कर हम धरती की जीवनी शक्ति सोख रहे हैं। हमारी संवेदनशीलता मरणासन्न है। ऐसे में तनिक हमें अपनी परम्पराओं पर भी दृष्टिपात करना चाहिए। यदि हम जल की बूँदों का, तालाबों, झीलों, नदियों और कुओं के प्रति तनिक भी संवेदनशील नहीं हैं तो हमें कोंछेक चाउर (विदाई के समय दिये जाने वाले चार) में और पूजापाठ में कुएं की दूब का प्रयोग बंद कर देना चाहिए। बाजार में सब खरीदने से मिलेगा इस दम्भ से बाहर निकलना चाहिये।

शिक्षा

शिक्षा
--------
यदि यह कहें कि आज की शिक्षा आत्मपरिष्कार नहीं आत्मप्रवंचना है तो अत्युक्ति न होगी। यह आत्म-संस्कार नहीं छल है। इस प्रवंचना और छल के लिये समाज, शिक्षक, अभिभावक और शिक्षानीति समान रूपसे दोषी एवं उत्तरदायी हैं।
अभी हाल ही में मैंने एक प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक व्यक्ति को यह कहते सुना कि मैं तो बस स्कूल आता-जाता हूँ। वहाँ पढ़ाना क्या? यह धारणा है उस शिक्षक की, जो व्यक्ति के शैक्षणिक संसार की नींव बनाता है। ऐसी धारणा केवल सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों की ही नहीं है अपितु प्राथमिक-माध्यमिक एवं उच्च सभी स्तरों के शिक्षकों की है। इसका कारण यह है कि शिक्षक एक प्रवृत्ति है, शिक्षक एक स्वभाव है जो व्यक्ति में अनुस्यूत होता है, जिसे विकसित नहीं किया जाता, जिसे तैयार नहीं किया जाता। आज की वास्तविकता यह है कि शिक्षक - स्वभाव वाला व्यक्ति या तो शिक्षा - जगत् तक पहुंच ही नहीं पाता अनेक अप्रासंगिक और अव्यावहारिक कसौटियों के कारण या तो समाज और परिवार के मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण वह शिक्षण से अधिक रुतबे वाले स्थानों की ओर जाता है। यही कारण है कि शिक्षक-स्वभाव का व्यक्ति शिक्षण में नहीं आ पाता और जो आते हैं उनमें से बहुत से शिक्षकों के लिए शिक्षण प्राथमिक नहीं होता।
समाज भी शिक्षा व्यवस्था में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षा की दुर्दशा हेतु वह भी समान उत्तरदायी है। शिक्षक को वह मात्र वेतनभोगी कर्मचारी समझकर व्यवहार करता है अतः उसकी संताने भी वैसा ही व्यवहार करती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि गुरु-शिष्य संबंध, क्रेता-विक्रेता सम्बद्ध में बदल जाता है।
शिक्षा नीतियाँ भी कम उत्तरदायी नहीं हैं। शिक्षा नीतियों के द्वारा उत्तरोत्तर शिक्षक को वेतनभोगी कर्मचारी और मजदूर बनाकर रख दिया गया है। आज शिक्षक से उस यंत्रवत् ज्ञान-उत्पादन की अपेक्षा की जा रही है। जबकि ज्ञान उत्पादन नहीं प्रकाशन का विषय है। यह मस्तिष्क में ईंट की तरह जड़ा नहीं जाता अपितु प्रकाश की तरह कौंधता है अपना स्थान और आकार लेता है।
शिक्षा का विषय ज्ञान और कौशल हैं। कौशल निरन्तर अभ्यास का प्रतिफल है और ज्ञान विवेक जागरण का परिणाम। आज ज्ञान को विभिन्न अलंकारों, भारी-भरकम स्कूल बैग, लाल-नीले-पीले स्कूल ड्रेस, पेरेंट्स - टीचर्स मीटिंग द्वारा बलात् मस्तिष्क में ठूँसने और बच्चों को यंत्रवत् अनुशासित बनाने का दिखावा चल रहा है। शिक्षा में आडम्बर की पराकाष्ठा है। बच्चों का बचपन अभिभावकों और समाज की आशाओं अपेक्षाओं की आग में स्वाहा हो रहा है। अभिभावकों का जीवन भी बच्चों में अचंभित कर देने वाली शक्ति के जागरण की प्रतिस्पर्धा में राख हो रहा है।
यह सोचने और सम्हलने का समय है।

कहाँ जा रहे काले कौवे?

चित्र: गार्गी महाविद्यालय परिसर

कौआ- सभी जानते हैं कि काला होता है। हमने अपने जीवन में दो प्रकार के कौवे अवश्य देखे होंगे पहला - जिसका चित्र नीचे दिया गया है। दूसरा-जिसका सम्पूर्ण शरीर काला होता है। चित्र में जो कौआ है उसकी गर्दन काली नहीं है अपितु कपोत वर्ण की है। यह नागरिक कौआ है, सभ्य कौआ है, इसे प्रायः घरेलू कौआ भी कहते हैं। यह प्रायः उन स्थानों पर पाया जाता है जहाँ का जीवन जंगलों से दूर है, जो स्थान पहले विकसित और संस्कृत हुये हैं, जिन स्थानों से जंगलों का विस्थापन शताब्दियों पहले हुआ है। जहाँ कंक्रीट के जंगलों का अग्रिम साम्राज्य बना है। जहाँ चिमनियों ने पहले धुँआ दिया है। जहाँ साखू-सागौन-शीशम को दरकिनार कर यूकेलिप्टस ने पहले अड्डा जमाया है।
दूसरे तरह का सम्पूर्ण काला कौआ उन क्षेत्रों में पाया जाता है, जो अभी अविकसित और आल्पविकसित हैं, जो वन क्षेत्र हैं या वन क्षेत्रों के निकट हैं। जहाँ अभी भी परम्परागत वृक्षों की अधिकता है। जहाँ अभी भी परम्परागत अधिवास शैली के अवशेष हैं।
अब कौवों के झुंड तो दिखना दुर्लभ है। हाँ कौवों के जोड़े अवश्य दिख जाते हैं।
मैंने सबसे पहले जिस कौवे को देखा और वर्षों तक जिसे एकमात्र कौआ समझती रही वह-सम्पूर्ण काला कौआ है। क्योंकि हमारे गाँव में मेरे बचपन में यही कौआ पाया जाता था। अब नगरीय कौआ भी पाया जाता है। यद्यपि दोनों की संख्या आश्चर्यजनक रूप से कम हुयी है।
प्रथम बार नगरीय कौवे से मेरा साक्षात्कार हैदरगढ़, बाराबंकी क्षेत्र में हुआ। प्रथमतः तो मैंने इसको भिन्न पक्षी समझा परन्तु आवाज कौवे सी होने पर यह भी भ्रम होता था कि कौआ है। वहाँ सम्पूर्ण काला कौआ नदारद था। इसलिए काले कौवे की अनुपस्थिति में इस दोरंगी कौवे को कौआ मानना पड़ा। मेरे यहाँ से यह कौआ भिन्न क्यों है? इस प्रश्न ने मेरे मस्तिष्क को खूब मथा। फोन का जमाना नहीं था अन्यथा अपने घर फोन करके मैं यह प्रश्न तत्काल पूछती। खैर मैंने वहाँ नाना-नानी, मामा सबसे कहा कि हमारे यहाँ ये कौआ नहीं होता। हमारे यहाँ काला कौआ होता है। इस बात पर पहले लोगों ने ध्यान नहीं दिया था। वहाँ लोग मुझे मेरे अवधी शब्दों को लेकर चिढ़ाया करते थे। मैं 'एक बार' के स्थान पर 'एक बाजी'बोलती थी क्योंकि गोंडा में 'एक बार', 'एक दफा' के स्थान पर 'एक बाजी' और 'एक दाँईं' भी बोला जाता था। चूंकि मामा के गाँव में मुस्लिम भी बहुत हैं और मुस्लिमों मे दीदी को 'बाजी' कहा जाता है, तो इसीलिए मेरे 'एक बाजी' पर वहाँ लोग मुझे चिढ़ाते थे और मैं चिढ़ती भी बहुत थी। मैं भी 'तुम पंचै', 'बच्ची-लौवा',' लोटा को' लुटिया/लोटिया', थाली/थरिया को 'टठिया', साँप को' कीरा' आदि उनके शब्दों पर उनको भी चिढ़ाने से पीछे नहीं हटती थी। उस समय मुझे 'आकाशवाणी - लखनऊ' पर बहुत क्रोध आता था क्योंकि उनके अवधी कार्यक्रमों में बाराबंकी की अवधी का बोलबाला होता था। खैर, 'बाजी' शब्द की तरह उन लोगों ने काले कौवे पर भी मुझे यह कहकर चिढ़ाना शुरू किया कि मेरा घर जंगल में है और मैं जंगली हूँ इसलिये वहाँ दोरंग वाला कौआ नहीं पाया जाता अपितु जंगली काला कौआ पाया जाता है। इसपर भी मैं चिढ़ती थी। वे लोग ऐसा इसलिए कहते थे क्योंकि उस समय मेरे गाँव में जब वे लोग आते थे तो जब घर के बिल्कुल पास पहुँचते थे तभी पता चलता था कि गाँव है अन्यथा बहुत से पेड़-पौधों से आवृत्त होंने के कारण दूर से लगता था कि बगिया है। उस समय 10-12 नीम-शीशम-कनेर-शहतूत-आम-जामुन के वृक्षों का द्वार पर होना आम बात थी। फिर घर के बाहर से ही बाग-बगीचों का शुरू हो जाना। मुझे बाराबंकी में गाँव देखकर बड़ा आश्चर्य होता था कि इतने कम पेड़ पौधे? साँस कैसे लेंगे। हालांकि इतने भी कम नहीं थे परन्तु हमारे यहाँ की अपेक्षा तो बहुत कम थे।... तो काले जंगली कौवे पर भी मैं चिढ़ती थी। इसपर मेरे बाबा ने समझाया कि हम प्रकृति के अधिक समीप हैं इसलिए अधिक प्राकृतिक तत्व हमारे पास हैं। हमें बुरा मानने की आवश्यकता नहीं है। हमारे यहाँ जल-स्तर बहुत निकट है। हम गड्ढा खोदकर भी जल निकाल सकते हैं। इसलिये हमारे यहाँ पौधे अधिक हैं। जब मुझे हमारी प्राकृतिक समृद्धि का ज्ञान हुआ तब जाकर हृदय को सान्त्वना मिली। हालांकि भाषायी विषय पर अभी भी हमारी तनातनी रहती है परन्तु अब मेरे पास चिढ़ाने के लिये और बहुत सी बातें हैं।
इस बार गांँव जाने पर मुझे नगरीय कौवे नजर आये। काले कौवे खोजने के लिए नजरों को बहुत स्थानों पर दौड़ना पड़ा। अब कौआ-दर्शन स्वाभाविक नहीं रहा। न मुँडेर पर तनिक जूठन की आस में कौआ बैठा रहता है। अब तो कुछ सुखाने के लिए कुछ अनाज आदि फैलाने पर उतनी रखवाली और 'कौआ हँड़ाने' की आवश्यकता नहीं होती जैसे पहले होती थी। अन्यथा 'तिलवा' के पूजा के लिए धोये जाने वाले तिल-अक्षत को कभी-कभी दो बार धुला पड़ता था या फिर से निकालकर तिल-चावल धुलना पड़ता था क्योंकि कौआ जूठा कर जाता था। कौआ हमारे लोक जीवन व पारिवारिक जीवन का महत्वपूर्ण पहलू है। कौआ ही वह पक्षी है जो योगवाशिष्ठ व रामचरितमानस में 'काकभुशुंडि' के रूप में सनातन है, परमज्ञानी है। कौआ ही वह पक्षी है जो एकाक्ष है यह हम जानते-मानते हैं। कौआ ही वह पक्षी है जिससे श्रीराम के लंकाविजयोपरान्त अयोध्या आगमन की प्रतीक्षा करती हुयी माता कौशल्या पूछती हैं कि हे कौवे, तुम सही - सही बताओ कि राम-लक्ष्मण-सीता कब आ रहे हैं। यदि तुम 'फुरि'अर्थात् सही बताओगे तो दोने में दूध-भात खिलाऊंगी और तुम्हारी चोंच सोने से मँढ़वा दूँगी-
कहौ काग फुरि बाता
दूध भात की दोनी दैहौं
सोने चोंच मँढ़इहौं... ।
कौआ ही वह पक्षी है जिसके मुँडेर पर बैठकर काँव-काँव करने से अतिथि के आगमन की सूचना मिलती है। ससुराल में रहने वाली न जाने कितने बेटियों की नजर और कान कौवे पर इसलिए टिके रहते थे कि उन्हें पता चले कि उनके मायके से कोई आने वाला है। न जाने कितने हृदय कौवे की काँव-काँव से इसलिए पुलकित होते थे, और प्रार्थना करते थे कि उनके भाई-भतीजे आ जायं। मायके की कुशल-क्षेम मिल जाय। बहुत से हृदय सोच में भी पड़ जाते थे और कौवे को कोसते भी थे कि - हे कौवे कंगाली में आटा गीला करने किसे बुला रहा है? किसके आगमन की सूचना दे रहा है?
कौआ ही वह पक्षी है जिसके द्वारा गृहस्थ हेतु शास्त्रसम्मत पंचमहायज्ञों में भूतयज्ञ सार्थक होती है। कौवे को पितरों का प्रतिनिधि मानकर भोजन अर्पित किया जाता है। आज इस कार्य हेतु कौवों का मिलना भी कठिन हो गया है।
कौआ ही वह पक्षी है जिसको बच्चों का प्रातः मुँह धुलाते हुये मातायें कहती थीं कि उठ जा, मुँह धुला ले अन्यथा तेरा दूध-भात कौआ खा जायेगा। और जब बच्चा उठकर मुँह धुलवाते हुये रोता था क्योंकि आँखे ठंड-गरम के प्रभाव से कीचड़ निकलने के कारण चिपकी होती थीं... तो माँ बच्चे को सान्त्वना देते हुये लोरी गाती थी कि-
कीचड़-काचड़ कौवा खाँयं
दूध-भात ललउवा खाँयं।
अर्थात् यह कीचड़ आदि कौआ खा जायेगा और मेरे लाल को खाने के लिए दूध-भात मिलेगा।
कौआ से समाज का शकुन-अपशकुन जुड़ा है। जहाँ एक ओर कौआ अथिति आगमन का सूचक हैं। वहीं दूसरी ओर यदि कौआ किसी के सिर पर बैठ जाय तो वह महान अपशकुन है और व्यक्ति के आसन्न मृत्यु का सूचक माना जाता है। समाज इसके लिये पूजा-पाठ, दान-पुण्य, टोटका आदि विभिन्न उपायों को अपनाता रहा है ताकि उस व्यक्ति की जीवन रक्षा हो सके जिसपर कौवे ने बैठकर मृत्यु की पूर्वसूचना दी है। मैंने सुना है कि इसके निवारण हेतु बहुत से लोग अपने प्रियजनों को व्यक्ति के मृत्यु की सूचना पहुँचाते थे। और फिर उससे उत्पन्न शोक से यह बाधा कट जाती थी, ऐसी मान्यता थी। इसलिए किसी के मृत्यु की सूचना आने पर लोग एक बार भगवान् से प्रार्थना करते थे कि हे भगवान् सच में ऐसा न हो, कौआ बैठ गया हो। लोग सांत्वना भी देते थे कि हो सकता है कि कौआ बैठ गया हो इसलिए ऐसी दुःखद सूचना आयी हो।
कौआ पक्षियों में एक ओर चतुर माना जाता है तो दूसरी ओर मूर्ख भी। हम सबने प्यासा कौआ वाली वह कथा अवश्य पढ़ी या सुनी होगी जिसमें प्यासा कौआ सुराही में कम जल होंने के कारण उसमें कंकड़ डालकर जल-स्तर ऊंचा करता है फिर अपनी प्यास बुझाता है। यह तो है कौवे की बुद्धिमत्ता। हमने यह भी सुना होगा कि अपने कंठ से मंत्रमुग्ध करने वाली चालाक कोयल कौवे के अंडों को नष्टकर उसके घोसले में अपना अंडा देती है। कौआ उस अंडे को सेता है और फिर जब बच्चे होते हैं तो वे तब तक मूक बने रहते हैं जब तक उनके पंख सशक्त न हों। उसके बाद वे अपना असली कोयल रूप दिखाकर उड़ जाते हैं। इसप्रकार कौआ मूर्ख बन जाता है। कोयल अपने इसी चालाकी के कारण 'परभृत' कहलाती है।
लता में लगने वाला एक फल होता है जो जिसकी लता परवल जैसी दिखती है और फल कुंदरू जैसा। उसे हमारे यहाँ 'कौआ की आरी-बारी' अर्थात् कौवे की खेती कहते हैं। वह फल विषाक्त माना जाता है। यद्यपि मुझे  लगता है कि विषाक्त नहीं है क्योंकि कौआ उसके पके फल पर अपनी चोंच मारता रहता है। इस तरह एक खेतिहर कौआ भी हम देखते हैं। 
हमारे आसपास बहुत से पक्षी थे जो हमारे स्वार्थवश लुप्त और लुप्तप्राय हो गये। गौरैया की चहँक कम हो गयी। कीटनाशकों ने कीट-पतंगों के साथ पक्षियों का जीवन हर लिया। हमारे नूतन भवन निर्माण शैली ने उनका आवास निगल लिया। वृक्षारोपण में नवीन वृक्षों की वृद्धि से उनका वृक्षों से सहजीवन समाप्त हो गया। हमने वे वृक्ष बोये ही नहीं जो विशाल बनें और जिनमें कोटरों के निर्माण का अवकाश हो। जिसके तने को फोड़कर कठफोड़वा को अपने आवास के निर्माण में रोमांच मिले। हम पौधों को बोनसाई बनाकर स्वयं महान बनकर जीने वाले युग के प्रवर्तक और प्रतिनिधि हैं। जिसमें हमारे सिवा सबकुछ हमें बौना, ओछा, छोटा और पिद्दी लगता है। हम अपने को विशाल, दीर्घ, विस्तृत, उन्नत और महान समझते हैं। हमारी महानता ने सब कुछ निगल लिया है। अनेक प्रजातियों की अस्थियों के ढेर पर चढ़कर हम कुछ ऊँचे हुये हैं। गिद्धों के लुप्तप्राय होने की कथा हम सभी जानते हैं। साँप को विषाक्त कह मार डालते हैं... नेवले और मोर का निवाला छीनते हैं और अपना विष बढ़ा महान बनते हैं। हमने तो कभी ध्यान ही नहीं दिया होगा कि आखिर वर्षा पश्चात् जुगुनुओं की जगमगाहट कम क्यों है? क्योंकि हम तो विद्युत-सूर्य के आविष्कारक हैं। हमने कभी ध्यान नहीं दिया होगा कि बरसात के दौरान और उसके बाद भूमि पर रेंगने वाले कीड़े-मकोड़े, कनखजूर, गोजर, राम जी की घोड़ियों(विधूटी) का घर-संसार क्यों नहीं दिख रहा? क्यों सिमट रहा है? हमें बढ़ते दीमक दिख रहे हैं क्योंकि वे शीशम सहित हमारे अन्य वृक्षों को सुखा रहे हैं। परन्तु हमने यह नहीं देखा या देखने का प्रयास नहीं किया कि प्रकृति की खाद्य-शृंखला को हमने ध्वस्त कैसे किया है? हम स्वयं में किस तरह रमे हुये हैं, मस्त हैं कि हमें कीट-पतंगों की परछाईं से भय लगता है। दीवारों पर रेंगती विषतुईया(छिपकली) हमें परमाणुबम जैसी विनाशकारिणी लगती है। कोई भी साँप चाहे विषाक्त हो या विषहीन, हमें प्राणहर्ता लगता है। यही नहीं देशी प्रजाति के कुत्ते हमें नहीं कराते, उनको कौरा खिलाने में हम कंजूसी करते हैं और उनकी घोर उपेक्षा करते हैं जबकि विदेशी नस्ल के कुत्तों से अपने गोद और ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाते हैं। दरबारी कवियों सा उनका गुणगान करते हैं।
इतना लिखने का तात्पर्य यह है कि अब गिद्धों की भाँति कौआ सहित अन्य पक्षीसमूह इतिहास की बात बन जायेगा और हम पावर प्वाइंट प्रजेन्टेशन द्वारा अथवा चित्रात्मक प्रोजेक्ट द्वारा आने वाली पीढ़ियों को कौवे का थ्री डी फोटो दिखायेंगे और उसकी विशेषता बतायेंगे। इस बात को हमारी आने वाली पीढ़ियाँ #Magic_Ralism की कोटि में रखेंगी।
आखिर हम विस्तार की ओर बढ़ रहे हैं या हमारे संवेदनाओं सहित अन्य सभी तत्वों का अभूतपूर्व संकुचन हो रहा है।
यह कैसा विकास है जो विनाश-लीला में कवलित असंख्य विकसित शिल्पों के अस्थियों पर सजा है।

Wednesday, March 21, 2018

आम पर बाँदा

फोटो:साभार-डाॅ. अरविंद मिश्र जी, जौनपुर 
हमारे पुरखों ने चाहे कुछ किया हो या न किया हो परन्तु वृक्षारोपण पर विशेषकर आम, बेल, फरेंद, गूलर, पीपल, बरगद आदि पर विशेष बल दिया था। यही कारण है कि आज भी शताधिक वर्ष पुराने वृक्ष हमारे गाँव में दिख जाते हैं। हालांकि मैंने बचपन से अनेक वृक्षों को मरते और कटते देखा है। प्रायः हर बगिया के आम के पौधे का एक नाम होता है । इस नामकरण के कई आधार हैं---प्रजाति के आधार पर जैसे-मालदहवा, सुगंध के आधार पर जैसे बिसैंधा, आकार के आधार पर जैसे-बेलहवा,हँड़ियहवा, रंग के आधार पर जैसे-सेंदुरहवा, गुण के आधार पर जैसे-रसहवा, चोपिहवा, स्वाद के आधार पर जैसे मिठउवा, खट्टहवा आदि । छोटे-छोटे गुच्छे में लगने वाले आमों को 'बहेरी' कहा जाता है।
अनेक आम उपेक्षा, भूमि के कटाव के कारण आँधी में गिरकर सूख गये। कुछ आमों की जीवनी शक्ति पीपल की परजीवी प्रकृति ने सोख लिया फलस्वरूप आज उनके स्थान पर पीपल सिर ताने खड़ा है। ऐसे कम से कम आठ पीपल हमारे गाँव में हैं जिन्होंने आम पर उगकर, आम का अस्तित्व समाप्तकर अपना विशाल आकार ग्रहण किया है।
एक परजीवी वनस्पति होती है जिसे बाँदा कहते हैं। यह आम, पीपल, बरगद आदि वृक्षों की फुनगी के पास आसन जमाती है। जिस डाल पर यह उग आती है उसमें बौर नहीं आता और उसका विकास रुक जाता है। यदि इस वनस्पति को काटकर पेड़ से अलग न किया जाय तो यही है कि यह पेड़ को धीरे-धीरे कमजोर बनाकर निष्प्राण कर देती है। बाँदा की पत्तियाँ चिकनी और थोड़ी-थोड़ी जामुन की पत्तियों के आकार की होती है। लसोढ़ा के पत्ती जैसी उनकी बाह्य सतह होती है। बाँदा में पीले और नारंगी फूल भी आते हैं। पंखुड़ियों के नीचे का रंग पीला और ऊपर का नारंगी होता है। बाँदा का ज्योतिष और तंत्र में विशेष महत्व है।
एक आम का पेड़ था जिसे सब 'लढ़उवा' कहते थे। बहुत सुन्दर और स्वादिष्ट आम होता था उसमें। उसकी की शाखाओं पर वर्षों तक बाँदा विराजमान था। कभी-कभी आँधी के झोंकों से बाँदा की शाखायें भूमि पर टूटकर गिर जाती थी। चूंकि 'लढ़उवा' जिस बगिया में लगा था वह पूरे गाँव की साझे की बगिया थी। इसलिए एक दूसरे के देखादेखी किसी ने उस वृक्ष के स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया। उसकी जड़ों को छूकर गाँव को जाने वाली सड़क जाती थी। प्राथमिक विद्यालय के ठीक सामने पड़ने के कारण विद्यार्थियों द्वारा भी वह वृक्ष कम नहीं सताया जाता था। शीत ऋतु में पेड़ की चैली(छाल) छुड़ाने वाले लोगों ने भी उस वृक्ष के स्वास्थ्य को बहुत हानि पहुँचामी। वृक्ष सीधा नहीं अपितु थोड़ा क्षैतिज था। पर इतना नहीं कि भूमि के समीप हो। किसी आँधी में वह झुक गया था। मेरे बचपन में उसकी फुनगी पर गिद्धों को मैंने बैठे देखा है। बाद में मोर आदि भी आँधी में उसकी शाखाओं में छिपते थे। सुग्गा (तोता) का एक कोटर भी था उसमें। मैं हर वर्ष जब गाँव जाती थी उसका गिरता स्वास्थ्य देखती थी। दुःख होता था परन्तु कुछ कर न सकी। साझे में होने के कारण लोगों की संवेदनाएं भी जड़ हो जाती हैं। तीन-चार वर्ष पहले की बात है जब घर जाना हुआ तो सहसा उस स्थान पर पहुंचकर कदम ठिठक गये। लगा कि बहुत अधिक सूनापन है, बहुत बड़ा रिक्त है। उस वृक्ष के न होने पर बहुत दुःख हुआ। यद्यपि हमारे घर के सदस्य उसको कभी-कभी सींचते थे परन्तु हर परिस्थिति उसके प्रतिकूल थी इसलिये वह सूख गया। और एक शून्य दे गया। मैंने सुना उस वृक्ष की लकड़ी कुछ लोगों के विवाह में पीढ़ा बनने के काम आयी और कुछ के शरीर की अंतिम लकड़ी बनी। समिधा समेत वह वृक्ष स्वाहा हो गया। परन्तु मेरी स्मृति में अभी भी शाखाओं पर बाँदा को आश्रय दिये लढ़उवा विद्यमान है।

उपभोक्ता

समाज में दो प्रकार के उपभोक्ता हैं। एक ठेठ उपभोक्तावादी और दूसरे उपभोक्तावाद के सुधारक पूर्णोपयोगितावादी। समाज को ही नहीं अपितु प्रकृति के सभी योनियों के जीवों को दोनों से खतरा है। उपभोक्तावादी सीधे मनुष्य को हानि पहुंचाता है क्योंकि उसके अति उपभोगवादी प्रवृत्ति के चलते वह व्यर्थ वस्तुओं का संग्रह कर उन्हें बर्बाद करता है, नष्ट करता है। वे वस्तुएं किसी अन्य व्यक्ति के लिये उपयोगी और महत्वपूर्ण हो सकती है।
अब उपभोक्तावाद का अतिसुधारक वर्ग पूर्णोपयोगितावादियों में अनेक व्यक्ति ऐसे होते हैं जो तृण-तृण, कण-कण का उपयोग करते हैं। सुधार की प्रवृत्ति और आवेग के कारण ये भारतीय जीवन के पञ्च महायज्ञों जिसमें भूतयज्ञ अर्थात् प्राणियों, पशु पक्षियों के प्रति अन्नदान इत्यादि को विस्मृत कर देते हैं। यही नहीं अति तो तब होती है जब कुछ लोग भोजन करते समय थाली में एक कण भी नहीं रहने देते। अर्थात् तनिक सा कणरूप में ही सही उच्छिष्ट (जूठा) नहीं छोड़ते। लगता है कि उनका खाने का पात्र माँजकर-धुलकर रखा गया है ऐसा करने से उन्हें इस बात का भान भी नहीं होता कि वे उन अनेक सूक्ष्म कीटों को खाद्य से वंचित कर रहे हैं जो हमारी खाद्य-शृंखला में बहुत महत्वपूर्ण हैं। साथ ही प्रकृति के प्रमुख घटक हैं। अति सर्वत्र वर्जयेत्