Tuesday, February 16, 2016

राष्ट्रद्रोही अपने कुकृत्यों व करतूतों द्वारा JNU में पढ़ने आने वाली देश की प्रज्ञा का अपमान न करें और उसे बदनाम न करें

JNU आजकल राष्ट्रद्रोही गतिविधियों, कश्मीर के अलगाववाद व पाकिस्तान-परस्त नारों के कारण चर्चा में है। कुछ लोगों व गिरोहों की काली करतूत के कारण यह प्रतिष्ठान अपनी प्रतिष्ठा खो रहा है। #JNU वह प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान है जिसने देश को अनेक नीति-नियन्ता, विचारक, शिक्षक, विद्वान व प्रशासक दिये हैं। हमारे सैन्य अधिकारियों को भी JNU डिग्री देता है। राष्ट्र-विकास व राष्ट्र-प्रतिष्ठा के विविध क्षेत्रों में इस विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यद्यपि यहाँ लगभग हल काल में कुछ राष्ट्रद्रोही व्यक्ति व गिरोह रहे हैं परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि पूरा विश्वविद्यालय ही द्रोही व विध्वंसात्मक है। यहाँ से अनेक ऐसी प्रतिभायें भी प्रसूत हुयी हैं जिन्होंने देश का गौरव बढ़ाया है। अनेक ऐसे लोग भी हुये हैं जो यहाँ विद्यार्थी जीवन में वामपंथ के तिलिस्म में फंसे तो जरूर पर परिसर से बाहर निकलते ही उस तिलिस्म से निकलकर राष्ट्रसेवा में लग गये। अनेक लोग हैं जिन्हें राष्ट्रीय अस्मिता का प्रत्यभिज्ञान हुआ है।
#JNU भारत का एक ऐसा विश्वविद्यालय है जहाँ आप न्यूनतम व्यय पर गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा सहजता से प्राप्त कर सकते हैं। #JNU वह संस्थान है जहाँ एक विद्यार्थी को तब प्रवेश मिलता है जब वह अपने स्तर के हजारो विद्यार्थियों में स्वयं को प्रवेश- परीक्षा द्वारा उत्तम सिद्ध करने में सफल होता है। #JNU एक ऐसा प्रतिष्ठान है जहाँ सोच व अभिव्यक्ति का नया आयाम व क्षितिज खुलता है (इसी अभिव्यक्ति का सहारा ले कुछ लोग अपना उल्लू भी सीधा करते हैं जैसे सम्प्रति प्रकरण में किया पाकिस्तान-परस्त बनकर) परन्तु अभिव्यक्ति की मर्यादित स्वतंत्रता व्यक्तित्व विकास का सहज व उत्तम अंग है।
#JNU की विशेषताएं उसकी न्यूनताओं से कहीं ऊँची हैं। पर एक बात और है कि विशेषताओं की ओट में राष्ट्रद्रोह को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता।
#JNU की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए,उसकी प्रतिष्ठा का सम्मान करते हुए आज वह समय है कि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को अंजाम देने वाले लोगों व गिरोहों का पर्दाफाश हो। राष्ट्रद्रोहियों का चेहरा देश के सामने आ गया है। #JNU की भूमि इनसे साफ हो। आज स्वच्छ JNU अभियान की आवश्यकता है। अभियान शुरू हो गया है बस अपेक्षा है कि सभी विचारधाराओं के सँारे सीकचों से बाहर आकर राष्ट्रवाद के साथ खड़े हों क्योंकि राष्ट्र सबसे ऊपर होता है।
दुर्भाग्य व चुल्लू भर पानी में डूबने का विषय है कि JNU के शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग इन गतिविधियों के साथ खड़ा नजर आता है। यह विचारणीय है कि जब उनकी संवेदना राष्ट्र के साथ नहीं है तो क्या उनका कोई उत्तरदायित्व राष्ट्र के साथ होगा क्या? आज यह प्रश्न पूछने की जरूरत है JNU के उन शिक्षकों से जो भारतीय अर्थव्यवस्था का करोड़ो डकारते हैं( जो कि आम जनता के खून पसीने की कमाई है ) कि उनकी राष्ट्र के प्रति निष्ठा क्या है? वे किसके साथ खड़े हैं -राष्ट्रद्रोह के साथ या राष्ट्रवाद के साथ?
अफजल के समर्थन में नारों एवं उसे शहीद घोषित करने की बात को दबाने के लिये jnu के विद्यार्थियों व देश की जनता का ध्यान विषय से हटाने के लिये अब समस्त वामपंथी एकसाथ हो मदारी बन कलाबाज़ी दिखाने लगे हैं और अन्य बातों पर बहस खीचने का प्रयास करते नजर आ रहे हैं। अपना चेहरा उजागर होने से इतना घबराये हुये हैं कि उलूल-जुलूल-फिजूल पर उतर आये हैं और उलूक बन बचने का आलोक खोज रहे हैं।
CPI नेता डी. राजा की सुपुत्री अपराजिता राजा स्पष्ट रूप से वीडियो में देखी जा सकती हैं इसलिये राजा इतना घबराये व बौखलाए कि बदहवास हो दल बल समेत jnu की ओर दौड़ पड़े। अब उन्हें अपने व अपनी पार्टी के विचारधारा के अस्तित्व का संकट सताने लगा है। अब पता चल गया है कि किस ओर हैं वो। पूरे वामपंथ की मिलीभगत व गलबँहियाँ सार्वजनिक हो गयी। भारत में वामपंथ भारत विरोधी गिरोहों की फैक्टरी है यह बात भी उजागर हुई।
सब सहा जा सकता है। सभी बातो को क्षमा किया जा सकता है पर राष्ट्रद्रोह अक्षम्य है। यह अपराध नहीं जघन्य पाप है जिसका न प्रायश्चित है न क्षमा।
अत: जो इस विषय पर अपनी अपनी बात रख रहे हैं। वे दो महत्वपूर्ण बातें ध्यान रखें कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व मानवाधिकार की आड़ में राष्ट्रद्रोह की इजाजत नहीं है। यह स्वीकार न होगा इसका कड़ा प्रतिकार होगा। दूसरा का चन्द द्रोहियों, गिरोहों, गिरहकट्टों, राष्ट्र के जेबकतरों, अलगाववादियो, आतंकवादियों, चापलूसों, चाटुकारों, स्वार्थियों, ढोंगियों, विषधर व्यालों, मातृहन्ता बिच्छुओं के कारण jnu की विद्वत् परम्परा को बदनाम न करें न होने दें। यह वहाँ के कार्यकर्ताओं की राष्ट्रीय चेतना का ही परिणाम है कि राष्ट्रद्रोह के इस कुकृत्य व करतूत को राष्ट्र जान पाया और राष्ट्रद्रोहियों व अलगाववादियों का चेहरा उजागर हुआ। #ABVP


#CPM का चरित्र और #JNU में राष्ट्रद्रोह: एक संबन्ध

सन् 2000 की बात है उस समय पश्चिम बंगाल में #CPM का गुण्डाराज हुआ करता था। उसने रामकृष्ण मिशन को भी गुण्डागर्दी का शिकार बनाया। वे चाहते थे कि मिशन के शिक्षण-संस्थाओं के संचालक संत न होकर कम्युनिस्ट हों और वहाँ कम्युनिस्ट शिक्षकों की नियुक्ति हो। इसके लिये उन्होंने संतो को डरा-धमकाया भी। जब डराने से बात नहीं बनी तब रामकृष्ण मिशन विद्यालय को नगरपालिका द्वारा प्राप्त होने वाले पानी को बन्द करवाकर विद्यार्थियों व शिक्षकों को प्यासा रहने पर मजबूर किया। समाचार पत्रों के विरोध के कारण मार्क्सवादियों को थोड़ा पीछे हटना पड़ा।
रामकृष्ण मिशन के प्रसिद्ध नरेन्द्रपुर विद्यालय में जिस समय स्वामी लोकेश्वरानन्द जी अध्यक्ष थे, उस समय मार्क्सवादियों ने वहाँ कर्मचारियों की हड़ताल करवायी। विद्यार्थियों व शिक्षकों का आवासीय परिसर होंने के कारण भोजन-पानीए बन्द हो गया।……….परन्तु विद्यार्थियों और शिक्षकों ने उनके मंसूबों को पूरा नहीं होंने दिया और वे परिसर तथा छात्रावासों में डटे रहे। स्वयं हर प्रकार का काम किया और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति की। समाज ने भी यथोचित सहयोग दिया। इस प्रकार CPM की गुण्डा सरकार का रामकृष्ण मिशन पर कब्जा जमाने व स्वामी विवेकानन्द के स्वप्नों को ध्वस्त करने का सपना अधूरा रह गया।
उपर्युक्त घतना का उल्लेख मैं यहाँ इसलिये कर रहीं हूँ कि इससे वामपंथ के चरित्र का पता चलता है। जिसका प्रमुख चरित्र है डराना-धमकान-दबाव बनाना और जब इससे भी बात न बने तब हड़ताल करवाना। यदि हड़ताल भी निष्प्रभावी हो तो उस तरह कत्ल का ताण्डव मचाना जिस तरह केरल में #ABVP #RSS के कार्यकर्ताओं व अपने विरुद्ध आवाज उठाने वाले हरएक व्यक्ति के साथ मचाया है इन्होंने।
कल हड़ताल होंने जा रही है #JNUTA की हड़ताल। जिस हड़ताल में JNUTA का दावा है कि सभी शिक्षक व विद्यार्थी भाग लेंगे। हालांकि इस दावे में इतनी सच्चाई नहीं है। JNU का विद्यार्थी अभी स्वयं को असहाय अनुभव कर रहा होगा (खासकर वे विद्यार्थी जो कम्युनिस्ट संगठनों, पार्टियों और गिरोहों के खुलेतौर पर या परोक्षरूप से समर्थक शिक्षकों के निर्देशन में अध्ययन-शोध कर रहे हैं।)। इसलिये एक ज्ञात-अज्ञात भय के कारण विद्यार्थियों की एक संख्या इस बन्द में अवश्य भाग ले सकती है पर वह सहभागिता निष्ठापूर्वक कम दबाव के चलते अधिक होगी।
आज JNU के वामपंथी संगठन और गिरोह, जिनके ही करतूतों से वास्तव में विश्वविद्यालय बदनाम हो रहा है और उसके मेधावान् विद्यार्थियों को अपमान का घूँट पीने पर मजबूर होना पड़ रहा है, मूल बात से ध्यान हटाने के लिये किसी भी हद पर उतर आने को बेताब हैं। आज ये और इनके आका लोग झूठों का पुलिन्दा बना-बकाकर विलाप से लेकर प्रलाप करने पर आमादा हैं। अपने इसी वाक्जाल में फँसाकर इन्होंने देश को अनेक बार बर्बाद करने की साजिश रची है। बंगाल को कंगाल किया है और इन्हीं हथकण्डों और विभिन्न मुखुटों के कारण इतने टुकड़ों में बंटे हैं कि इन्हें स्वयं अपने टुकड़ों और छद्म मुखौटों को याद रखने के लिये रजिस्टर तैयार करना पड़ा होगा।
ये फिर एक बार फेक, झूठा और दिखावे का अमोनियम क्लोराइड अपने नेत्रों से बहाने पर आमादा हैं सिर्फ इसलिये कि देश की जनता का ध्यान JNU में घटी राष्ट्रद्रोह की घटना से हटे और फिर ये अपने मजे में दशकों तक जनता के खून-पसीने की कमाई पर ऐश करें तथा अपने कुकृत्यों व करतूतों द्वारा JNU में पधने आने वाली देश की प्रज्ञा का अपमान करें और उसे बदनाम करें।

वामपंथ के कुपंथ पर शिकंजा

वामपंथियों और उनके द्वारा समर्थित गिरोहों द्वारा हमेशा से #JNU में राष्ट्रद्रोही गतिविधियाँ होती रही हैं। यह कोई नयी बात नहीं है। देश के प्रतिभावान् विद्यार्थी जो अच्छी शिक्षा हेतु इस विश्वविद्यालय में प्रवेश करते हैं उनको उनके मार्ग से भटकाकर, बरगलाकर, नशेड़ी बनाने और कुछ हद तक राष्ट्रद्रोही बनाने का कार्य भी ये वामपंथी समूह और संगठन करते रहते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हेम मिश्रा है, जिसे महाराष्ट्र पुलिस ने नक्सलवादी गतिविधियों में संलिप्तता के आधार पर गिरफ्तार कर जेल भेजा था।
2010 में जब दन्तेवाड़ा में नक्सलियों द्वारा 76 जवानों की हत्या की गयी थी तब इन्हीं गिरोहों ने गोदावरी छात्रावास के सामने जश्न का आयोजन किया था। उस समय भी इस बार की भाँति #abvp ने इनका कड़ा प्रत्युत्तर दिया था और इनके इस कुकृत्य के विरोध में JNU के आमछात्र सड़क पर उतरे थे।
इस बार इनके इस राष्ट्रद्रोही कार्य में नयी बात यह है कि इनके विरुद्ध ऑडियो-विजुवल प्रमाण हैं। मीडिया भी अपेक्षाकृत सकारात्मक भूमिका निभा रही है। पूरे देश में सकारात्मकता की लहर है। सबसे बड़ी बात की इस समय देश में कांग्रेस की रीढ़विहीन सरकार नहीं है अपितु एक सकारात्मक सोच वाली राष्ट्रवादी सरकार है। इन्हीं सब कारणों से इन देशद्रोहियों पर शिंकजा अब कसने लगा है। यह बहुत ही सार्थक पहल है। ऐसा २-३ दशक पूर्व ही हो जाना चाहिये था।

Sunday, February 7, 2016

आचार्य अभिनवगुप्त

साभार:
http://abhinavagupta.jkstudycentre.org/
आचार्य अभिनवगुप्त साहित्य के विद्यार्थियों और नाट्यशास्त्र के अध्येताओं के लिये एक सुपरिचित व्यक्तित्व हैं। आचार्य अभिनवगुप्त भरतमुनिप्रणीत नाट्यशास्त्र के टीकाकार, काव्यशास्त्रमर्मज्ञ और प्रमुख शैवाचार्य हैं। उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र के एक प्रमुख सिद्धान्त ’ध्वनिसिद्धान्त’ के आधारभूत ग्रन्थ ’ध्वन्यालोक’ पर लोचन नामक टीका की रचना की। ’ध्वन्यालोक’ आचार्य आनन्दवर्द्धन प्रणीत सिद्धान्तग्रन्थ हैं, जिसके अन्तर्गत काव्य के विभिन्न पक्षों पर विशद चर्चा करते हुये उत्तम काव्य को ध्वनिकाव्य माना गया है। यहाँ यह बात ध्यातव्य है कि ’काव्य’ शब्द का प्रयोग केवल कविता के लिये न होकर समस्त साहित्य के लिये हुआ है, जिसमें गद्य और पद्य दोनों सम्मिलित है। आचार्य आनन्दवर्द्धन प्रणीत ’ध्वन्यालोक’ के द्वारा उद्भूत ’ध्वनि’ के ’आलोक’ को तभी देखा जा सकता है जब आपके पास नेत्र-स्वरूप आचार्य अभिनव की ’लोचन’ टीका हो। अतएव लोचन की जितनी भी प्रशस्ति की जाय न्यून ही होगी। आचार्य अभिनवगुप्त ने लोचन में ध्वनिप्रतिष्ठापक आचार्य आनन्दवर्द्धन से एक कदम आगे बढ़ते हुये ’रसध्वनि’ की उद्भावना की है,जो भारतीय एवं विश्व काव्यशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्र को उनकी अभूतपूर्व देन है। यह आचार्य अभिनव का अवदान ही है जिसके कारण ध्वनिसिद्धान्त भारतीय काव्यशास्त्र के समस्त सिद्धान्तों में शिरोमणि बना और परवर्ती आचार्यों एवं साहित्यशास्त्रियों ने इसकी श्रीवृद्धि की।
भारतीयकाव्यशास्त्र को आचार्य अभिनव की दूसरी बड़ी देन उनके द्वारा भरतमुनिप्रणीत प्रसिद्ध नाट्यशास्त्रीयग्रन्थ ’नाट्यशास्त्र’ पर की गयी टीका ’अभिनवभारती’ है। ’अभिनवभारती’ विद्वत्जनों के मध्य टीका नहीं अपितु पृथक ग्रन्थ के रूप में उसी प्रकार समादृत है जैसे कि महाभारत महाकाव्य का एकांश श्रीमद्भगवद्गीता। आज स्थिति यह है कि ध्वनिसिद्धान्त और नाट्यशास्त्र दोनों के विषय में आचार्य अभिनव प्रमुख प्रमाण हैं। यह ’अभिनवभारती’ ही है जिसके माध्यम से हम रससूत्र के पूर्ववर्ती टीकाकारों भट्टनायक, भट्टलोल्लट और श्रीशंकुक के विषय में जान पाते हैं। भारतीय शास्त्र-रचना-परंपरा में पूर्वपक्ष का विशेष महत्त्व है जिसके वर्णन और उसके द्वारा स्थापित बातों के विधिवत् सन्तोषजनक खण्डन के बिना कोई अपनी बात को स्थापित नहीं कर सकता। अतएव पूर्वपक्ष के उद्धरणों द्वारा अनेक आचार्यों के व्यक्तित्त्व व कृतित्त्व के विषय में ज्ञान प्राप्त होता है। यह परम्परा विभिन्न आचार्यों के काल-निर्धारण और पौर्वापर्य निर्धारण में बहुत सहायक रही है।
ये तो वे पक्ष हैं जिनसे जनमानस का और विशेषकर साहित्यशास्त्रियों, अध्येताओं का परिचय है। परन्तु इससे भी एक अन्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पक्ष है आचार्य अभिनवगुप्त के व्यक्तित्त्व और कृतित्व का वह है उनका दार्शनिक पक्ष। आचार्य अभिनवगुप्त के व्यक्तित्व में उनके दार्शनिक पक्ष की प्रधानता रही है और उनका काव्यशास्त्रीय पक्ष भी उनकी दार्शनिक धारा से प्रभावित रहा है। परन्तु उनके दार्शनिक पक्ष की चर्चा और उसके सन्दर्भ में ज्ञान बौद्धिक वर्ग में बहुत कम रहा है। इसके अनेक कारण हो सकते हैं, जिनमें से एक बड़ा कारण भारतीयदर्शन का ’षड्दर्शन’ के रूप में रूढ़ हो जाना भी है। अपर कारणों में विभिन्न विश्वविद्यालयों में दर्शन के पाठ्यक्रम और शैवदर्शन की शाक्त और तन्त्र से यत्किञ्चित सम्बद्धता भी है।
 आचार्य अभिनवगुप्त के व्यक्तित्व का प्रमुख आयाम है कि वे एक शैवाचार्य थे। काश्मीर-शैव-दार्शनिक सिद्धान्तों पर उन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया। आचार्य अभिनव ने तन्त्रालोक, तन्त्रसार, मालिनीविजयवार्त्तिक, परमार्थसार, परमार्थचर्चा आदि ग्रन्थों की रचना की इसके अतिरिक्त ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी, ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी एवं भगवद्गीतार्थसंग्रह आदि उनके द्वारा प्रणीत प्रसिद्ध टीकायें हैं। उन्होंने काश्मीर शैव के मूल तत्त्वों शिव एवं शक्ति के स्तुति व आराधना हेतु स्तोत्रों की रचना भी की है जिनमें क्रमस्तोत्र, भैरवस्तोत्र, अनुत्तराष्टिका, अनुभवनिवेदनस्तोत्र, देहस्थदेवताचक्रस्तोत्र आदि प्रमुख हैं।
यह हमारे लिये सौभाग्य का विषय है कि अन्य अनेक संस्कृत आचार्यों की भाँति आचार्य अभिनवगुप्त के स्थितिकाल के विषय में हमें अँधेरे में नहीं रहना पड़ा है। आचार्य का स्थितिकाल निश्चित करना सम्भव हुआ है। उनका समय ज्ञात है क्योंकि उन्होंने स्वयं कहा है कि ’ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ पर उनकी ’बृहतीवृत्ति’ 1015 ई. में रची गयी और ’क्रमस्तोत्र’ एवं भिरव-स्तोत्र की रचना क्रमशः 990-991 ई. व 992-993 ई. में हुयी ।[1]
इस वर्ष भारतीय संस्कृति के सुधीजनों, प्रमुख धर्माचार्यों, साहित्यकारों, साहित्यशास्त्रियों, काश्मीर-परम्परा के विशेषज्ञों और भारत के सिरमौर कश्मीर की विद्वत्परम्परा के प्रति जिज्ञासु चिन्तकों द्वारा आचार्य अभिनवगुप्त सहस्त्राब्दी वर्ष के आयोजन का संकल्प लिया गया है। वर्षपर्यन्त देशभर में चलने वाले इस आयोजन से विद्वत्जन, विद्यार्थी, युवा, समाज, व पूरा देश आचार्य अभिनवगुप्त के माध्यम से कश्मीर के पुरातन वैभव को समझेगा, जानेगा और विचार करेगा। इसके माध्यम से सौन्दर्य और देवों की नगरी कश्मीर की ज्ञानराशि का उद्घाटन होगा। वर्तमान में बारूद और अलगाववाद के आतंकी मंसूबों से कश्मीर को सुलगा रहे आततायी भी बेनकाब होंगे।




[1] संस्कृत काव्यशास्त्र का इतिहास, सुशील कुमार डे, पृ. 94

Friday, June 19, 2015

योग दिवस: वैश्विक शान्ति और समन्वय की आधारशिला

अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस का मनाया जाना एक परिवर्तन का संकेत है। यह एक Paradigm shift का श्रीगणेश है, जिसमें पूरा विश्व एक साथ है। कापरनिकस के बाद एक परिवर्तन आयाथा, डेकार्ट के साथ एक परिवर्तन आया था जिसने विश्व का नक्शा ही बदल दिया। इस परिवर्तन ने विश्व को बनाया या बिगाड़ा यह एक लम्बा विमर्श है। पर यह तो तय है कि इससे कुछ आबाद हुये तो कुछ बर्बाद हुये, पूरा विश्व एक साथ आह्लादित नहीं हुआ।
आज योग दिवस से जो परिवर्तन हो रहा है, आइंसटाइन के बाद से विश्व इस परिवर्तन की आशा कर रहा था। यह एक सकारात्मक परिवर्तन है। यहाँ कहीं संहार नहीं सर्वत्र सृष्टि है, कहीं शस्त्र-प्रहार नहीं सर्वत्र श्रद्धा, भक्ति, अनुरक्ति है। भौतिकता से बँधे संसार की यह मुक्ति है। योगदिवस भौतिकता से अध्यात्म की ओर प्रस्थान है। इस प्रस्थान में पूरा विश्व कदमताल कर रहा है। योगदिवस भारत-भारतीयता की वह विजय है जिसके लिये कभी रक्तपात नहीं हुआ, जिसके लिये कभी अस्त्र-शस्त्र नहीं चमके, जिसने कभी व्यर्थ प्रसार की स्वार्थपूर्ण इच्छा नहीं रखी, जिसने कभी धनबल और बाहुबल के सहारे हृदयों को नहीं जीता। यह ऋषियों की निःस्वार्थ, सेवा, साधना और दर्शनशक्ति का प्रतिफलन है  जो हृदय जीतता नहीं जिस पर हृदय न्यौछावर होता है। यह वह परमार्थसिद्धि है जो पाश (बन्धन) के न होते ही बद्ध कर लेती है संसार को। यह ज्ञान और प्रज्ञा की विजय है। यह शस्त्र पर शास्त्र की विजय है। स्वार्थ पर परमार्थ की विजय है। विखण्डन पर संलयन की विजय है। यह ’आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः’ (अर्थात् ’अच्छे विचारों को सब ओर से आने दो) को चरितार्थ करने वाली एक प्रत्यक्ष घटना है। यह ऐसी ऐतिहासिक घटना है जो आने वाले वर्षों में विश्व-शान्ति की नींव सिद्ध होगी। यह इस बात का द्योतक है कि विश्व अब संघर्ष नहीं शान्ति और समन्वय की तरफ बढ़ रहा है।

तुम किस मुँह से बोल रहे हो?

आजकल गहरे लाल से खूनी लाल, रक्तपिपासु लाल और थक-हारकर हल्के लाल बने जितने वामपंथी संगठन और गिरोह इस देश में परजीवियों की तरह पल रहे हैं वे भी कांग्रेसी सुर में अपनी चिरपरिचित शैली में #Lalitmodi प्रकरण पर हुका-हुवाँ-हुवाँ कर रहे हैं। इसमें तनिक भी आश्चर्य नहीं है। यही इन आस्तीन के साँपों की कार्यनीति रही है जिसके कारण ये स्वतन्त्रता के बाद से ही एक दबाव समूह बनाकर भारत सरकार से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अपनी बेजा माँगे मनवाते रहें हैं और ऐश फरमाते रहे हैं। ये गरीबों, दलितों एवं महिलाओं के आँसुओं में उपस्थित सोडियम की मात्रा का सौदा करके अपना घरौंदा मजबूत करते रहे हैं। आज जब सरकाअर के विकासोन्मुख नीतियों द्वारा इनके सोडियम के धन्धे में दिनोंदिन कमीं आ रही है और दुकान पर ताला लगने की आशंका है तो ये  उस जोंक की तरह छटपटा रहें हैं जो किसी पशु के शरीर से खून चूस-चूसकर मोटी हो रही थी पर अभी-अभी उस पर नमक दाल दिया गया हो।
इन्हें ठीक से पहचानने का यह सुअवसर है। ये वही लोग हैं जो अफजल गुरु की फाँसी का विरोध करते हैं और मानवाधिकार की दुहाई देते हुये मार्च करते हैं। ये वही लोग हैं जो गिलानी से गलबहियाँ डाले खड़े दिखायी देते हैं। ये वही लोग हैं तो तरुण तेजपाल जैसे महिलाओं के प्रति अत्याचारी व्यक्ति को अन्तिम क्षण तक सच्चरित्र घोषित करने का प्रयास करते हैं, ये वही लोग हैं जो #Shobha_Mandi जैसी अनगिनत वनवासी, गिरिवासी महिलाओं से बलात्कार करके स्त्रीपक्षधर का मुखौटा पहने रहते हैं ये वही लोग हैं जिन्होंने अपने शासन काल में #Tapasi_Malik की बलात्कार करने के बाद हत्या की। वस्तुतः इनका कोई चरित्र ही नहीं है और बोलने की कोई औकात भी नहीं पर पिछले ६० सालों से शासन-तन्त्र इनकी बकबक सुनता आया है और आज नहीं सुन रहा है इसलिये ये बौरा गये हैं। इनको बौखलाहट भी है कि ये धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो रहे है, इनका चेहरा जनता के सामने साफ हो रहा है ।
वृंदा करात को भी बहुत पीड़ा है ऐज़यूज़ुअल...पर बंगाल को कंगाल करते समय सीपीआई एम के उच्च पद पर बैठी इस महिला को कोई पीड़ा नहीं हुयी। बंगाल और केरल में अपने शासन के इतिहास में दलितों, महिलाओं और वनवासियों पर इनका इतना भी वात्सल्य नहीं उमड़ा और करुणा नहीं उपजी कि उनमें से कोई एक भी इनकी पार्टी में शीर्ष न सही शीर्ष से एक पग नीचे तक पहुँच पाता।
आतंकवादियों के मानवाधिकार के पैरोकार आज मानवता के आधार पर की गयी एक छोटी सी सहायता के प्रति इतने लामबद्ध हो रहे हैं, यह इनका चरित्र दर्शाता है, स्वभाव बताता है और मनोभावों को उद्घाटित भी करता है।
भोपाल गैस काण्ड के मुख्य अभियुक्त वॉरेन एण्डरसन को बचाने वाली कांग्रेस और ओतावियो क्वात्रोची से रिश्ता निभाकर राष्ट्रदोह करने वाली कांग्रेस किस मुँह से ललित मोदी प्रकरण पर सुषमा स्वराज जी का त्यागपत्र माँग रही है? जब कांग्रेस ने हजारों निर्दोषों के मौत के दोषी को तो अपने आँचल में छिपाकर देश से बाहर पहुँचाया था तब इस्तीफा क्यों नहीं माँगा? जब इटली के हाथ भारत को गिरवी करने के षड्यन्त्र का पर्दाफाश हुआ तब इस्तीफा क्यों नहीं माँगा? जो कांग्रेस मानवता के हत्यारों को बचाते हुये कभी सकुचायी नहीं, शर्मायी नहीं, पछतायी नहीं वह भला मानवता के आधार पर किसी की तनिक भी सहायता कैसे सहन कर रकती है? मानवता को मण्डियों में बेचने का परम्परागत कारोबार जो रहा है कांग्रेस का। पर कमसे कम गुनाहगारों को किसी के सदाशयपूर्ण कार्य पर हो-हल्ला मचाकर गुनाह साबित करने की जुर्रत नहीं करनी चाहिये। #Sushamaswaraj ने वही किया जो भारतीय चिति के अनुरूप है। मानवता की पहचान है और विदेश मन्त्री ने उस पहचान के अनुरूप ही कदम उठाया।
और जो लोग इस बात को लेकर कुछ ज्यादा ही ’कन्सर्न’ हं कि #lalitmodi एक एक्यूज्ड हैं और उनकी सहायता हुयी, वे पहले लालू यादव जैसे अपराधियों के साथ बैठना बन्द कर दें जो न केवल एक्यूज्ड रहें है बल्कि जिनको कोर्ट से बाकायदा सजा मिल चुकी है। ऐसा करने के बाद लोग बात करें कि एक विदेश मन्त्री को देश का कोई नागरिक बाहर किसी देश में संकट में है, उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये।

Monday, December 22, 2014

गंगा को मलिन करके हम न केवल आत्महन्ता अपितु आत्मभक्षी भी बन रहे हैँ

प्रयाग का नाम आते ही ध्यान आता है-तीर्थराज प्रयाग, कल-कल प्रवाहित निर्मल गंगा। परन्तु इसके साथ ही तुरन्त ध्यान आता है कि गंगा की निर्मलता तो कल की बात थी आज तो गंगा के निर्मल प्रवाह को लगातार मलिन किया जा रहा है। नमामि गंगे गंगा को पुनः निर्मल बनाने का एक पुनीत प्रयास है। हमें आस है कि भारत सरकार का यह प्रयास सार्थक एवं सफल हो। गंगा को प्रदूषण ने एक दिन में नहीं डँसा है। यह शताब्दियों का दंश है जिसकी तीव्रता एवं विष लगातार बढ़ते हुये कालकूट बन रहा है। वस्तुतः गंगा का प्रदूषण भारतीय जनमानस के प्रदूषण की अभिव्यक्ति है, उसके विचार व व्यवहार  परिवर्तन की परिणति है। गंगा पवित्र थी उस भारतीय मानस के पवित्रता भाव से जहाँ 'गँगाजल सा निर्मल' उपमा बसती थी, गँगा जहाँ निर्मलता, पवित्रता व  वात्सल्य की कसौटी थी। आज वह प्रवाह मलिन है, मन्द है क्योकि हमारा मानस भी मलिन एवं स्वच्छन्द है, हम केवल अपने विषय में सोचते है। हमारा ध्येय सर्वकल्याण द्वारा आत्मकल्याण नहीं केवल आत्मकल्याण बन गया है। कृपण, स्वार्थी एवं दूषित हृदय से उदार, उदात्त और पवित्र कार्य नहीं होता। आज हम भले गंगा को माता कहते हैं शाब्दिक अभ्यासवश पर मन में उसके प्रति माँ का भाव नहीँ आता। उसके प्रति मातृवत् प्रेम एवं स्नेह नहीं उमड़ता। गँगा के निर्मलता हेतु आवश्यक है मानस की निर्मलता एवं पवित्रता। आवश्यक है कि अर्घ व आचमन के जल से कोई कुल्ला न करे। गंगा को मलिन करके हम न केवल आत्महन्ता अपितु आत्मभक्षी भी बन रहे हैँ।