Sunday, June 22, 2014

हिन्दी-विमर्श: गृह मन्त्रालय द्वारा हिन्दी-प्रोत्साहन पर विशेष

गृह मन्त्रालय द्वारा हिन्दी को प्रोत्साहित किया जाना बहुत ही स्वागत योग्य कदम है। यदि इसका सही क्रियान्वयन होता है तो न केवल हिन्दी का आत्मविश्वास बढ़ेगा अपितु समस्त भारतीय भाषाओं की चमक वापस आयेगी। अंग्रेजी जैसी अ-बौद्धिक भाषा भारत की समस्त भाषाओं पर ग्रहण बनकर व्याप्त हो गयी है, जिससे न केवल इस देश की संस्कृति प्रभावित हो रही है अपितु साहित्य भी सिकुड़ रहा है। आज स्थिति यह हो गयी है कि बहुत से ऐसे पढ़े-लिखे लोग हैं जिनको अपनी भाषा में अपनी भावनाओं को ठीक से व्यक्त कर पाने में समस्या का अनुभव होता है। अंग्रेजी को अ-बौद्धिक भाषा कहना बहुत ही उपयुक्त है क्योंकि यदि इसके साहित्य की आधारशिला देखी जाये तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि किस तरह ग्रीक और लैटिन के खण्डहरों पर उगी हुयी काई है यह भाषा? ये अम्ग्रेज लोग बड़े ही गर्व से इलियड, ओडिसी, इनीद को अपने महाकाव्यों में सम्मिलित करते हैं। बहुत ही घमण्ड के साथ प्लेटो, अरस्तू को उद्धृत करते हैं। इसके साथ ही इनका इतिहास ग्रीक को कुचलने, लैटिन को फूँकने में संलग्न रहा है। दूसरी भाषा का अस्तित्त्व समाप्त कर उसके साहित्य सम्पदा पर आधिपत्य कर ये लोग राजा बने हुये हैं। यदि अंग्रेजी को देखा जाये तो जॉन मिल्टन के पैराडाइज लॉस्ट एक महाकाव्य मिलता है। पिछले शताब्दियों से अंग्रेजी की बौद्धिकता बढ़ाने का प्रयास निरन्तर चल रहा है, जिसके अन्तर्गत विश्व का समस्त समृद्ध साहित्य भण्डार अनूदित किया जा रहा है।
याहाँ प्रश्न अंग्रेजी के विरोध का भी नहीं है। किसी विरोध से सकारात्मकता नहीं प्रारम्भ होती। यहाँ अपनी भाषा का प्रसंग है। उस भाषा का जो स्वतन्त्रता आन्दोलन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी। जिसके माध्यम से क्रान्तिकारियों को दिशा दी गयी। जो परतन्त्र भारत के व्यथा की अभिव्यक्ति का माध्यम थी। जब हम हिन्दी भाषा की बात करते हैं तब उसके साथ-साथ हिन्दी की अनेक बोलियाँ जिसका क्षेत्र पंजाब से लेकर अरुणाचल तक विस्तृत है, सभी उसमें सम्मिलित होती हैं। इस प्रकार यह सीधे तौर पर एक व्यापक भूभाग की भाषा है। इसके साथ ही इस देश के सभी महानगरों एवम् बड़े नगरों में भी हिन्दी स्वतः स्वीकृत है। अतः यदि हिन्दी के संवर्द्धन की बात होती है तो यह किसी करुणानिधि अथवा जयललिता को बुरी नहीं लगनी चाहिये। यदि यह बात तमिलनाड़ु के नेताओं को खटकती है तो निश्चय ही यह उनके राजनैतिक द्वेष का परिणाम है।
संविधान सभा के विद्वान् सदस्यों ने १२-१४ सितम्बर १९४९ को गहन विचार-विमर्श और बहस के बाद हिन्दी को कामकाज की भाषा और अंग्रेजी को १५ वर्ष तक सहयोगी कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकार किया था। इसमें कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी, गोपालस्वामी आयंगर प्रभृत लोग सम्मिलित थे। नेहरू का भी मानना थी कि किसी देश की उन्नति अपनी ही भाषा से ही हो सकती है। देश को एकता के सूत्र में पिरोने के लिये हिन्दी आवश्यक थी। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी(जिन्होंने प्रारम्भ में हिन्दी का विरोध किया था) ने भी हिन्दी को स्वीकार किया। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी हिन्दी के प्रबल समर्थक थे।
गृह मन्त्रालय द्वारा हिन्दी के प्रोत्साहन का स्वागत किया जाना चाहिये। यदि हिन्दी समृद्धि होगी तो तमिल, मलयालम, कन्नड़, बांग्ला, असमिया, गुजराती, मराठी, बोडो, संथाली, मणिपुरी, तेलुगु आदि सभी भाषायें समृद्ध होंगी। सभी के साहित्य-निधि का आदान-प्रदान होगा। 
बस हिन्दी का यह प्रोत्साहन कागजों और वक्तव्यों तक सीमित होकर न रह जाय, इसी बात का ध्यान रखना है। यदि यथार्थ में यह क्रियान्वित हो और बैठकों के विवरण् अतक के लिये अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पर निर्भरता कम हो, समाप्त हो, तो यह भाषा के जीवन के क्षेत्र में गृहमन्त्रालय का क्रान्तिकारी कदम होगा। इससे संस्कृति समृद्धि होगी, देश का आत्मविश्वास बढ़ेगा। उपनिवेशवादी मानसिकता से थोड़ा मुक्ति मिलेगी और भारत का युवा चेयर को कुर्सी और टेबल को मेज कहने में सकुचायेगा नहीं, लगायेगा नहीं।

Saturday, June 21, 2014

डॉ. हेडगेवार एवं भारतीय राष्ट्रवाद


आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक पूज्य डॉ. हेडगेवार जी की पुण्यतिथि के अवसर पर भारत नीति प्रतिष्ठान द्वारा "डॉ. हेडगेवार एवं भारतीय राष्ट्रवाद" विषय पर व्याख्यान का आयोजन हुआ। जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. कृष्णगोपाल जी, सरकार्यवाह (राष्टीय स्वयंसेवक संघ) का उद्बोधन सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। प्रो. कपिल कपूर जी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की एवम् डॉ. अवनिजेश अवस्थी जी ने कार्यक्रम का विद्वत्तापूर्ण, सुव्यवस्थित एवं सफल सञ्चालन किया।
डॉ. कृष्णगोपाल जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि "भारत का प्रत्येक व्यक्ति स्वीकार करता है कि पूरा समाज एक है। यहाँ कोई भी प्रार्थना ऐसी नहीम् है जिसमें सबके कल्याण की बात न करके एक व्यक्ति के कल्याण की बात की गयी हो। इस देश का मौलिक सिद्धान्त है "सर्वे भवन्तु सुखिनः", "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" । इस सिद्धान्त के सर्वजनसमन्वय में एकात्मबोध है। केवल अपने लिये चिन्तन करने वाला अभारतीय है। पूर्वोत्तर की २२२ जनजातियों में किसी ने कभी भी एक -दूसरे पर अतिक्रमण नहीं किया, न ही दूसरे की पूजा-पद्धति और मान्यताओं को अमान्य बताया। यह है भारत के मौलिक सिद्धान्त में निहित सहिष्णुता की भावना। यह है भारत का मौलिक प्रवाह। जो परम्परा के प्रवाह में हजारों वर्ष से प्रवाहित है, वह है राष्ट्रदर्शन। जो पचाने का एवं सहिष्णुता का साहस रखना है वह दर्शन हिन्दु-राष्ट्र का है।  जो भी राष्ट्र-तत्त्व की गहराई में जायेगा उसे इसी मौलिकता का दर्शन होगा। इसी सनातल सत्य को समझकर निष्ठा के साथ प्रवाहित होने वाली धारा है संघ।"
इस अवसर पभारत नीति प्रतिष्ठान के निदेशक एवं संघ-विचारक प्रो. राकेश सिन्हा जी ने "डॉ. हेडगेवार एवं उपनिवेशविरोधी आन्दोलन" विषय पर प्रकाश डालते हुये राष्त्राय स्वयंसेवक संघ की विभिन्न स्वतन्त्रता आन्दोलनों में भूमिका पर तथ्यपूर्ण प्रकाश डाला तथा उन्होंने बताया कि किस प्रकार संघ की स्वतन्त्रता आन्दोलन में भूमिका को इस देश के मार्क्सवादी, नेहरूवादी इतिहासकारों द्वारा नियोजित तरीके से नजरअन्दाज किया गया है और किस प्रकार राष्ट्रीय अभिलेखागार में संघ से सम्बन्धित दस्तावेजों को नष्त करने की दुर्नीति अपनायी गयी है। तथ्यों से खिलवाड़ और तथ्य छुपाने का एक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करते हुये उन्होंने संविधान सभा में २ माह तक धर्मनिरपेक्षता पर चली बहस (जिसका इतिहासकार कहीं उल्लेख तक नहीं करते) एवं नेताजी बोस द्वारा शम्कर राव देव को RSS पर लिखे पत्र एवं शम्कर राव देव द्वारा उसके उत्तर का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संघ की भूमिका को लेकर मार्क्सवादी, नेहरूवादी इतिहासकारों ने न केवल चुप्पी साधी है बल्कि उसके दस्तावेजों को नष्ट करने का भी काम किया है।
प्रो. कपिल कपूर जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि डॉ. हेडगेवार अपने समय के विभिन्न क्रान्तिकारी एवं राष्ट्रवादी व्यक्तियों से इसी रूप में भिन्न हैउं कि उन्होंने गुरु गोरखनाथ और गुरु अर्जुनसिंह जैसे एक संगठन खड़ा किया और उस संगठन के माध्यम से आत्मजागरण को प्रोत्साहित कर समाज को एक ऊर्जा एवं विश्वास से भरा, सोये सांस्कृतिक मूल्यों को पुनर्जागृत करने एवं पुनर्प्रतिष्ठित करने का बीड़ा उठाया।
#RSS #IPF  #nationalism ॑#राष्ट्रवाद,

इस अवसर पर डॉ. राहुल सिंह, श्री गोपाल अग्रवाल, डॉ. शरदिन्दु मुखर्जी सहित बडी संख्या में प्रबुद्ध जन एवं छात्र-छात्राओं तथा शोधार्थियों की उपस्थिति रही।

Friday, June 13, 2014

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, हिन्दी के एक आधार स्तम्भ के रूप में प्रसिद्ध हैं। ये सेठ 
अमीचन्द के वंशज थे, जिन्होंने सिराजुद्दौला और क्लाइव के मध्य समझौता 
करवाया था। अपने धन के विषय में इनका कहना था कि " जिस धन ने हमारे पुरखों 
को नष्ट किया उसको हम नष्ट करेंगे।" ये व्यक्ति नहीं वर्न् संस्था थे। 
इअन्के सान्निध्य में हिन्दी के अनेक मूर्धन्य विद्वानों का जन्म हुआ।
आज भारतेन्दु जी के जीवन का एक बहुत ही मार्मिक प्रसंग अचानक याद आ गया। 
रामनगर (वाराणसी) के राजा इनके समवय थे और इनके परम् मित्र हुआ करते थे। 
किसी कारणवश भारतेन्दु जी और राजा रामनगर में मनमुटाव हो गया था। भारतेन्दु
 जी अस्वस्थ थे और शैय्या पर लेटे हुये थे। ऐसी अवस्था में उन्होंने सुन्दर
 अन्योक्ति का सहारा लेकर गोपिकाओं के विरह-वर्णन द्वारा अपने मित्र को 
अपने मन की व्यथा बतायी। राजा रामनगर को उन्होंने पत्र में लिखा-

आजु लौं जौ न मिले तौ कहा हम तो तुमरे सब भाँति कहावैं।
मेरौ उराहनौ है कछु नाहिं सबै फल आपने भाग को पावैं।
जो हरिचन्द भई सो भई अब प्राण चले चँहैं तासो सुनावैं।
प्यारो जु है जग की यह रीति विदा के समय सब कण्ठ लगावैं॥

कितनी गहन भावाभियंजना है। गोपिकाये कृष्ण से कहती हैं कि अब प्राण-पखेरु 
उड़ने वाले हैं, अब तो आकर अन्तिम समय भेंट कर लो। वैसे भी हम तो सभी प्रकार
 से तुम्हारे ही हैं । हमें कोई उलाहना नहीं देना है, सभी को उसके भाग का 
फल मिलता है।
राजा रामनगर को यह पत्र भारतेन्दु जी ने तब लिखा जब वे गम्भीर रूप से 
अस्वस्थ थे और अन्तिम दिन निकट था। कितना मार्मिक प्रसंग है। जब यह पत्र 
राजा को मिला तो वे भारतेन्दु जी से मिलने आये। उनकी दवा भी करवायी । 
परन्तु राजयक्ष्मा से पीड़ित होंने की कारण भारतेन्दु जी ने इस संसार से 
विदा ले ली।
यह पत्र भारतेन्दु जी के हृदय का एक करुण-दर्पण है। जो सभी के हृदय में 
समान संवेदना जागृत उत्पन्न करता है।