Friday, August 29, 2008

प्रेम

भारतीय संस्कृति में प्रेम के अनेक रूप हैं-वात्सल्य,स्नेह,अनुराग,रति,भक्ति,श्रद्धा आदि। परन्तु वर्तमान समय में प्रेम मात्र एक ही अर्थ में रूढ हो गया है, वो है प्यार जिसको अंग्रेज़ी मे "LOVE" कहते हैं। प्रथमतः प्रेम शब्द कहने पर लोगो के मस्तिष्क में इसी "LOVE" का दृश्य कौंधता है। प्रत्येक शब्द की अपनी संस्कृति होती है । उसके जन्मस्थान की संस्कृति, जहाँ पर उस शब्द का प्रथमतः प्रयोग हुआ। अतः प्रेम और "LOVE" को परस्पर पर्यायवाची मानने की हमारी प्रवृत्ति ने प्रेम शब्द से उसकी पवित्रता छीन ली है। परिणामतः प्रेम शब्द कहने से हमारे मस्तिष्क में अब वह पावन भाव नही आता जो हमें मीरा,सूर, कबीर,तुलसी, जायसी, घनानन्द, बोधा, मतिराम, ताज, रसखान,देव और बिहारी प्रभृत हिन्दी कवियों तथा कालिदास जैसे संस्कृत कवियो की रचनाओं में देखने को मिलता है। आज हम विस्मृत कर चुके हैं कि इस"LOVE" के अतिरिक्त भी प्रेम का कोई स्वरूप होता है।
आज का "प्रेम कागज़ी फूलों के गुलदस्तों" में उलझकर अपनी वास्तविक सुगन्ध खो बैठा है। आज हम अपने शाश्वत, सनातन प्रेम के उस स्वरूप को विस्मृत करके गर्वानुभूति से फूले नही समाते जिसके कारण भारत अतीत काल में शताब्दियों तक विश्व के लिये दर्शनीय और स्पृहणीय बना रहा तथा मुगल सम्राटों तक ने जिसको महत्त्व दिया। जो संस्कृति जिस वस्तु के जितने रूपों का दर्शन करती है उसके पास उस वस्तु के लिये उतने शब्द होते हैं । हमारे ऋषियों ने , हमारे स्वनामधन्य पूर्वजों ने प्रेम के असंख्य रूपों को देखा था, उसी दर्शन का परिणाम है कि हमारी संस्कृति में प्रेम के लिये अनेक शब्द हैं। इस शब्दों के मर्म को ऎसा कोई व्यक्ति नही समझ सकता जिसने इसे अनुभव न किया हो। क्योंकि इसको शब्दो द्वारा पूर्णतः व्याख्यायित करना असम्भव नही तो दुष्कर अवश्य है। प्रेम कोई गुड्डे-गुडियों का खेल नही सच्चे अर्थों में यह एक साधना है । प्रेम जैसे शब्द की जो अपने अन्तस् में अनेक शब्दों को सँजोये हुए है "LOVE" जैसे उथले शब्द से तुलना करना निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है और कहीं न कहीं अपने बारे में हमारी अल्पज्ञता का परिचायक है । इसके विष्य में एक तरफ कहा गया है कि-"प्रेम कौ पन्थ कराल महा तलवार के धार पर ध्याइबो है" तथा दूसरी तरफ कहा गया है कि"अति सूधो प्रेम कौ मारग है जहाँ नैकु सयानप बाँक नहीं"। हमारे कवियो ने उषाकाल से ही प्रेम के स्वरूप पर चर्चा करनी प्रारम्भ कर दी थी चाहे वह पुराणी युवती उषा के विषय में हो अथवा पुरुरवा-उर्वशी के आख्यान के रूप में हो । कालिदास ने तो प्रेम का अद्भुत रूप चित्रित ही किया है। यदि हम सम्पूर्ण भारतीय साहित्य पर विहंगम दृष्टि डाले तो शायद ही किसी भाषा का कोई कवि बचा हो जिसने इस विषय पर अपनी कलम न चलायी हो। पर आज जिस संकुचित अर्थ में प्रेम को लिया जा रहा है उस अर्थ में उसे कभी नहीं लिया गया।

Thursday, August 28, 2008

शलभ

शलभ!
तुम जल गये
जलकर मर गये
लेकिन तुम रोये नहीं
इस नन्दनवन में खोये नहीं
क्या तुम्हारे जीवन में
लुभावने अवसर नही आये ?
क्या तुमको कभी हीरक चकाचौंध नही भायी ?
बोलो
बोलते क्यों नहीं?
मौन क्यों हो मुनियों की तरह
कहीं तुम्हारा ये मौन स्वीकरण तो नही ?
या तुम इसे तुच्छ स्थापनीय कोटि का
प्रश्न समझकर
गौतम बुद्ध की तरह अनुत्तरित
रखना चाहते हो ।
सच-सच बताना शलभ
मौन से काम नही चलेगा
ये गौतम बुद्ध का समाज नही है
विज्ञान की विजय है आज
बता दो अपने अपरिग्रह का कारण
नही नार्को टेस्ट से गुजरना पडेगा
यदि नही बताते
तो जाओ शलभ
आज तुम्हें हम छोडते हैं
हमें तुम्हारी मंशा पता चल गयी है
कि तुम अखबारों, पत्रिकाओं का
हज़ारों पन्ना अपने
व्यक्तित्व और कृतित्व से रंगाये बिना
अपना राज़ नही खोलोगे
अभी राज़ खोल देने से कितने लोग जानेगे भला?
यहां किसी को तब तक नही जाना जाता है
जब तक वह हज़ारों वृक्षों की जान लेकर
’पापुलर’ न हो जाय
इस बात को शायद तुम
अच्छी तरह जानते हो
इसीलिये
प्रतीक्षा कर रहे हो मधुमास की
कि जब वह आयेगा तब तुम भी
अपनी "पंचम" तान छोडकर
दूसरों के मल्हार को मात दे दोगे
खैर ठीक है अवश्य मिलेगा
तुमको उचित चढावा
प्रतीक्षा करो मधुमास की
लोग तुम्हारी तान अवश्य सुननें आयेंगे
आश्वस्त रहो
क्योंके आजकल लोगो को
"बेस्ट सेलर" चाहिये
क्वालिटी चाहे कुछ भी हो।


अरे ! ये क्या तुम हमारा आश्वासन सुन
उठ बैठे?
अरे भाई हम तो बस
सहानुभूति दिखाने आये थे
कि कोई यह न कहे
कि बडे खुदगर्ज हैं
शलभ तुमने गलती की जो
तुम हमारी बाते सुन ज़िन्दा हो गये
तुम्हे फिर से मरना होगा
अपने लिये नही
तो कम से कम हमारे लिये
हमारी इज़्ज़त के लिये
तुम्हे इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये
क्योकि तुम हमारे "वादों" से
भली-भांति परिचित हो।