Monday, September 8, 2008

जब मेरे पुत्र इन आस्तीन के साँपों के लिये फिर ....................

मैं कभी
सोने की चिड़िया था
कभी नन्दनवन था
कभी मैं
देवों के लिये मनभावन था
प्रसारित होता था
मुझसे......
एकता प्रेम, विश्वबन्धुतव का
संदेश
था मैं शान्ति का प्रतीक
अति पावन था यह भारत देश
पर आज
मेरी सीमाएँ
सुलग रही हैं
कही माओवदी आग लगा रहे हैं
कही अलगाववादी लोगों को
भगा रहे हैं
कही आतंकवादी
हमको उड़ाने की
योजना बना रहे हैं
कहीं बन विस्फोट हो रहे हैं
कही सरे आम गोलियाँ चल रही हैं
कही पर कर्फ्यू लगा है
कही प्रदर्शन हो रहा है
ये सब देख कर मैं रो पड़ता हूँ
सच में........
आज मैं केसी करुण कवि की
कारुण्यपूर्ण कविता से भी
करुण कविता हूँ
हमनें अपने ऊपर ही पालें हैं
आस्तीन के साँप कई
आज वो हम्को दँसने लगे हैं
हमको हमारी सीमाओं के
संकोच में कसने लगे हैं
सदियों से की गयी सहृदयता का
ये सुपरिणाम है
हमारे अनेक भू-भाग आज
हमारे दुष्मनों के नाम हैं
कभी कभी अपना पुनरावलोकन भी
करने लगता हूँ मैं
तब हमें लगता है कि
कितना ग़लत किया था
इन आस्तीन के साँपों को पालकर
अन्त में बैठ जात हूँ मै
अपने विचारों से हारकर
और सोचता हूँ
मेरी व्यथा तभी कथा बन सकेगी रामायणी
जब मेरे पुत्र इन आस्तीन के
साँपों के लिये
फिर ....................
"जनमेजय का नागयज्ञ"
करेंगे
और इअस बार
वे इन नागों को
छिपने का कोई अवसर नही देगें
एक-एक कर सबको..........................

1 comment:

मुकेश कुमार मिश्र said...

बहुत अच्छी कविता है ।
धन्यवाद