Wednesday, November 25, 2009

जलवायु परिवर्तन: उपनिवेशवाद

जलवायु परिवर्तन वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व हेतु एक गम्भीर समस्या है। इस समस्या को लेकर क्योटो प्रोटोकॉलके तर्ज पर कोपेनहेगन में आगामी माह में सम्मेलन होने वाला है। यह जलवायु परिवर्तन सीधे तौर पर विश्व मेंविगत शाताब्दियों से हुए आर्थिक परिवर्तन से सम्बद्ध है॥ आज मानव में प्रकृति के प्रति ममता का नामोनिशानतक लगभग मिट गया है। औद्योगिक क्रान्ति के बाद से ही प्रकृति का अन्धाधुन्ध दोहन और शोषण हुआ है।इतिहास इस बात का साक्षी है कि किस प्रकार उपनिवेशवादी शक्तियों ने अपने उद्योगों के विकास और प्रथम द्वितीय विश्व युद्धों हेतु युद्धक सामग्री समुद्री जहाज, बेड़े आदि बनाने के लिये संसार की सम्पन्न वन राशि को नष्टकिया है। किस प्रकार अंग्रेजो, डचों, फ्रांसीसियों और अन्य तात्कालिक शक्तियों ने अपने-अपने उपनिवेशों कीजनता का आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक शोषण के साथ-साथ बड़े पैमाने पर प्राकृतिक शोषण भी किया है।किस प्रकार एक सघन प्राकृतिक पारितन्त्र का आमूलचूल परिवर्तन करने में इन शक्तियों का हाथ रहा है , इतिहासके पृष्ठ के पृष्ठ इसके विवरण से भरे पड़े हैं। जावा, सुमात्रा, बर्मा, हिमालय के प्रसिद्ध वनों को नष्टप्राय करने का श्रेयइन्हीं को जाता है। यही नहीं उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के सघन जंगलों एवं पशुओं का सर्वनाश करने का भी श्रेयइन्हीं को जाता है। इनके इन करतूतों को बयाँ करती हुई जॉन डासन की एक पेंटिग है "When vallies was full" जिसमें अमेरिका के जंगलों और वहाँ के पशुओं को चित्र किया गया है। ये उपनिवेशवादी लोग उस स्थान को आबादही नहीं समझते थे जहाँ जनजातियाँ रहती थी। आबाद होने का इनका अपना ही बनाया पैमाना था कि जहाँ खेतीहोती है मात्र वो भू भाग आबाद है। इसीलिये ये जब ये आस्ट्रेलिया पहुँचे तो इनका दावा था कि वो महाद्वीप खालीथा। जबकि सत्य यह है कि वहाँ पहले से लोग रहते थे। इन्होंने ही सिंहभूम के जंगलों के साल के वृक्षों को स्लीपरोंहेतु, चटगाँव की पर्वतीय पट्टी तथा रंगून के वनों को समुद्री बेड़ों के लिये विनष्ट किया। इतने विनाश के बाद वानिकीके नाम पर भी ये पारितन्त्र का स्वास्थ्य बिगाड़ने में पीछे नहीं रहे। इन्होंने व्यावसायिक वानिकी प्रारम्भ की औरविविध प्रकार के वृक्षों के स्थान पर पापुलर, देवदार आदि एक ही प्रजाति के वृक्ष लगाये। इस प्रकार इन्होंने वनों मेंवृक्षों में प्रजाति वैभिन्य को समाप्तप्राय कर दिया जिससे कई प्रजातियाँ लुप्त हो गयीं। इस प्रकार शनैः-शनैः येउपनिवेशवादी शक्तियों ने विगत दो शताब्दियों से सम्पूर्ण विश्व का प्राकृतिक विनाश किया है, पारितन्त्र को नष्टकिया है और आज भी लगातार करते जा रहे हैं। इसी भोगवादी, सुविधासम्पन्न और प्रकृति के प्रति क्रूर प्रवृत्ति कापरिणाम इस समय जलवायु परिवर्तन के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है। अब अति हो चुकी है। पानी सिर के ऊपरनिकल चुका है। अब तो इस का कुछ समाधान निकालना ही होगा। अन्यथा वह दिन बहुत दूर नहीं है जब आज केवैज्ञानिकों द्वारा लगाये जा रहे समस्त अनुमान अक्षरशः सत्य सिद्ध होंगे तथा हमारी अग्रिम पीढ़ी आज से भीअधिक विषाक्त वातावरण में जीवित रहने को विवश होगी।