Skip to main content

दहेज

स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी आज हम वस्तविक रूप से सभ्य नही हो पाये हैं । फिर भी स्वयं को सभ्य कहतेहुए हमें कोई शर्म नही आती ।दहेज आज भी एक दानव के समान हामरे बीच व्याप्त है। न केवल वह अस्तित्व में हीहै अपितु दिन-प्रतिदिन वह पुष्ट होता जा रहा है । उसकी बेल दिन दूना रात चौगुना बढ़ रही है । सच है पर थोड़ाकड़वा है वैसे सच का स्वभाव होता है कड़वा होना आज का धनी वर्ग सबसे अधिक दहेज लोभी है । उसने दहेज कानाम परिवएतन अवश्य किया है पर माल वही है । कुल मिलाकर बात वही है नई बोतल में पुरानी शराब । ये प्रथादिन प्रतिदिन और भयावह होती जा रही है । आज दहेज के कारण कितनी निर्मलाओं की अधिक उम्र के लड़के सेशादी कर दी जा रही है इसका कोई रेकार्ड सरकार के पास न कभी रहा है न रहेगा भी । आखिर ऎसा रेकार्ड रहेगाकैसे इस पर तो समाज के तथाकथित दिग्गजों दूसरे शब्दों मे बड़े लोगों का पहरा होता है । ऎसे में क्या माज़ाल कीसरकारी नासिका को इसकी सुगन्ध लग जाय । मामला जब धन के लेनी देनी का हो तब तो सरकारी नाक को पानीमें भिगो-भिगोकर ज़ुकाम कराया जाता है ताकि उसे उसकी नाक के तले की गन्ध का भी पता तक न चले भविष्यमें कोई मामला उठने पर वह मेडिकल सर्टिफिकेट दिखा सके की उसे ज़ुकाम था । कै बार ऎसे मेंतो मेढकियों तकको ज़ुकाम होते देखा गया है। चाहे क्यों न यह समाज के लिये अज़ूबा हो पर ऎसे अवसरों पर मेढकी को भी ज़ुकामहो सकता है आखिर आम भी तो इमली हो सकता है मोटी रकम हथियानी है न किसी शिकार को फँसाकर अन्यथापत्नी व बच्चों के पाँच सितारा होटलों में खाने, पार्टियों में जाने के शौक कैसे पूरे होंगे?
ये शौक तो पूरे करने ही हैं चाहे कितनी ही निर्मलाओं की मौत हो चाहे कितने ही प्रेमचन्द उनकी व्यथा -कथा लिखेपर ये शौक तो सबसे आगे है उससे सरकारी नाक को कोई सरोकार नही वह प्रेमचन्द को पड़कर द्रवित नही होसकती वो बातें तो आउटडेटेड हैं । उसको तो जुकाम कराकर आपना काम निकालना है । तभी तो वह समाज मेंसफल माना जायेगा ।इस दहेज की समस्या की अनदेखी बड़े लोगों की नाक भी हमेशा करती है क्योंकि इसमेपड़कर उसकी "प्रतिष्ठा" न धूमिल हो जाय।

Comments

Mukesh said…
शोभनम्...

Popular posts from this blog

राष्ट्रद्रोही अपने कुकृत्यों व करतूतों द्वारा JNU में पढ़ने आने वाली देश की प्रज्ञा का अपमान न करें और उसे बदनाम न करें

JNU आजकल राष्ट्रद्रोही गतिविधियों, कश्मीर के अलगाववाद व पाकिस्तान-परस्त नारों के कारण चर्चा में है। कुछ लोगों व गिरोहों की काली करतूत के कारण यह प्रतिष्ठान अपनी प्रतिष्ठा खो रहा है। #JNU वह प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान है जिसने देश को अनेक नीति-नियन्ता, विचारक, शिक्षक, विद्वान व प्रशासक दिये हैं। हमारे सैन्य अधिकारियों को भी JNU डिग्री देता है। राष्ट्र-विकास व राष्ट्र-प्रतिष्ठा के विविध क्षेत्रों में इस विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यद्यपि यहाँ लगभग हल काल में कुछ राष्ट्रद्रोही व्यक्ति व गिरोह रहे हैं परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि पूरा विश्वविद्यालय ही द्रोही व विध्वंसात्मक है। यहाँ से अनेक ऐसी प्रतिभायें भी प्रसूत हुयी हैं जिन्होंने देश का गौरव बढ़ाया है। अनेक ऐसे लोग भी हुये हैं जो यहाँ विद्यार्थी जीवन में वामपंथ के तिलिस्म में फंसे तो जरूर पर परिसर से बाहर निकलते ही उस तिलिस्म से निकलकर राष्ट्रसेवा में लग गये। अनेक लोग हैं जिन्हें राष्ट्रीय अस्मिता का प्रत्यभिज्ञान हुआ है। #JNU भारत का एक ऐसा विश्वविद्यालय है जहाँ आप न्यूनतम व्यय पर गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा सहजता से...

प्रेम

भारतीय संस्कृति में प्रेम के अनेक रूप हैं-वात्सल्य,स्नेह,अनुराग,रति,भक्ति,श्रद्धा आदि। परन्तु वर्तमान समय में प्रेम मात्र एक ही अर्थ में रूढ हो गया है, वो है प्यार जिसको अंग्रेज़ी मे "LOVE" कहते हैं। प्रथमतः प्रेम शब्द कहने पर लोगो के मस्तिष्क में इसी "LOVE" का दृश्य कौंधता है। प्रत्येक शब्द की अपनी संस्कृति होती है । उसके जन्मस्थान की संस्कृति, जहाँ पर उस शब्द का प्रथमतः प्रयोग हुआ। अतः प्रेम और "LOVE" को परस्पर पर्यायवाची मानने की हमारी प्रवृत्ति ने प्रेम शब्द से उसकी पवित्रता छीन ली है। परिणामतः प्रेम शब्द कहने से हमारे मस्तिष्क में अब वह पावन भाव नही आता जो हमें मीरा,सूर, कबीर,तुलसी, जायसी, घनानन्द, बोधा, मतिराम, ताज, रसखान,देव और बिहारी प्रभृत हिन्दी कवियों तथा कालिदास जैसे संस्कृत कवियो की रचनाओं में देखने को मिलता है। आज हम विस्मृत कर चुके हैं कि इस"LOVE" के अतिरिक्त भी प्रेम का कोई स्वरूप होता है। आज का "प्रेम कागज़ी फूलों के गुलदस्तों" में उलझकर अपनी वास्तविक सुगन्ध खो बैठा है। आज हम अपने शाश्वत, सनातन प्रेम के उस स्वरूप को व...

योगवाशिष्ठ

योगवाशिष्ठ को महर्षि द्वारा रचित माना जाता है। योगवाशिष्ठ पूर्णतः दार्शनिक ग्रन्थ है। इसमें रामकथा के माध्यम से मोक्षोपाय का कथन किया गया है इसीलिये इसे मोक्षोपाय शास्त्र भी कहा जाता है। रामकथा इसकी मुख्य कथा है जिसके अन्तर्गत अवान्तर आख्यानों अवं उपाख्यानों से सच्चिदानन्द ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय बताया गया है। योगवाशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ जीए स्वयं कहते हैं कि द्वारा ज्ञात वस्तु का ज्ञान दूसरे को अनुभूत करवाने के लिये दृष्टान्त से बढ़कर कोई दूसरा साधन नही है। इसीलिये इस ग्रन्थ में हमें पग - पग पर दृष्टान्त मिलता है। योगवाशिष्ठ की रचना किसी साधारण मानस द्वारा सम्भव ही नही हो सकती इसकी रचना कोई त्रिकालज्ञ उदात्त ऋषि ही कर सकता है जिसका मानस मुक्त मानस हो। क्योंकि बद्ध मानस मुक्त मानस की बात ही नही कर सकता। योगवाशिष्ठ का रचनाकार मात्र एक ऋषि ही नहीं वरन् एक कवि भी है। कवि अथवा ऋषि का कार्य मात्र उपदेश देना ही नहीं होता अपितु उपदिष्ट वस्तु ...