Sunday, February 7, 2016

आचार्य अभिनवगुप्त

साभार:
http://abhinavagupta.jkstudycentre.org/
आचार्य अभिनवगुप्त साहित्य के विद्यार्थियों और नाट्यशास्त्र के अध्येताओं के लिये एक सुपरिचित व्यक्तित्व हैं। आचार्य अभिनवगुप्त भरतमुनिप्रणीत नाट्यशास्त्र के टीकाकार, काव्यशास्त्रमर्मज्ञ और प्रमुख शैवाचार्य हैं। उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र के एक प्रमुख सिद्धान्त ’ध्वनिसिद्धान्त’ के आधारभूत ग्रन्थ ’ध्वन्यालोक’ पर लोचन नामक टीका की रचना की। ’ध्वन्यालोक’ आचार्य आनन्दवर्द्धन प्रणीत सिद्धान्तग्रन्थ हैं, जिसके अन्तर्गत काव्य के विभिन्न पक्षों पर विशद चर्चा करते हुये उत्तम काव्य को ध्वनिकाव्य माना गया है। यहाँ यह बात ध्यातव्य है कि ’काव्य’ शब्द का प्रयोग केवल कविता के लिये न होकर समस्त साहित्य के लिये हुआ है, जिसमें गद्य और पद्य दोनों सम्मिलित है। आचार्य आनन्दवर्द्धन प्रणीत ’ध्वन्यालोक’ के द्वारा उद्भूत ’ध्वनि’ के ’आलोक’ को तभी देखा जा सकता है जब आपके पास नेत्र-स्वरूप आचार्य अभिनव की ’लोचन’ टीका हो। अतएव लोचन की जितनी भी प्रशस्ति की जाय न्यून ही होगी। आचार्य अभिनवगुप्त ने लोचन में ध्वनिप्रतिष्ठापक आचार्य आनन्दवर्द्धन से एक कदम आगे बढ़ते हुये ’रसध्वनि’ की उद्भावना की है,जो भारतीय एवं विश्व काव्यशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्र को उनकी अभूतपूर्व देन है। यह आचार्य अभिनव का अवदान ही है जिसके कारण ध्वनिसिद्धान्त भारतीय काव्यशास्त्र के समस्त सिद्धान्तों में शिरोमणि बना और परवर्ती आचार्यों एवं साहित्यशास्त्रियों ने इसकी श्रीवृद्धि की।
भारतीयकाव्यशास्त्र को आचार्य अभिनव की दूसरी बड़ी देन उनके द्वारा भरतमुनिप्रणीत प्रसिद्ध नाट्यशास्त्रीयग्रन्थ ’नाट्यशास्त्र’ पर की गयी टीका ’अभिनवभारती’ है। ’अभिनवभारती’ विद्वत्जनों के मध्य टीका नहीं अपितु पृथक ग्रन्थ के रूप में उसी प्रकार समादृत है जैसे कि महाभारत महाकाव्य का एकांश श्रीमद्भगवद्गीता। आज स्थिति यह है कि ध्वनिसिद्धान्त और नाट्यशास्त्र दोनों के विषय में आचार्य अभिनव प्रमुख प्रमाण हैं। यह ’अभिनवभारती’ ही है जिसके माध्यम से हम रससूत्र के पूर्ववर्ती टीकाकारों भट्टनायक, भट्टलोल्लट और श्रीशंकुक के विषय में जान पाते हैं। भारतीय शास्त्र-रचना-परंपरा में पूर्वपक्ष का विशेष महत्त्व है जिसके वर्णन और उसके द्वारा स्थापित बातों के विधिवत् सन्तोषजनक खण्डन के बिना कोई अपनी बात को स्थापित नहीं कर सकता। अतएव पूर्वपक्ष के उद्धरणों द्वारा अनेक आचार्यों के व्यक्तित्त्व व कृतित्त्व के विषय में ज्ञान प्राप्त होता है। यह परम्परा विभिन्न आचार्यों के काल-निर्धारण और पौर्वापर्य निर्धारण में बहुत सहायक रही है।
ये तो वे पक्ष हैं जिनसे जनमानस का और विशेषकर साहित्यशास्त्रियों, अध्येताओं का परिचय है। परन्तु इससे भी एक अन्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पक्ष है आचार्य अभिनवगुप्त के व्यक्तित्त्व और कृतित्व का वह है उनका दार्शनिक पक्ष। आचार्य अभिनवगुप्त के व्यक्तित्व में उनके दार्शनिक पक्ष की प्रधानता रही है और उनका काव्यशास्त्रीय पक्ष भी उनकी दार्शनिक धारा से प्रभावित रहा है। परन्तु उनके दार्शनिक पक्ष की चर्चा और उसके सन्दर्भ में ज्ञान बौद्धिक वर्ग में बहुत कम रहा है। इसके अनेक कारण हो सकते हैं, जिनमें से एक बड़ा कारण भारतीयदर्शन का ’षड्दर्शन’ के रूप में रूढ़ हो जाना भी है। अपर कारणों में विभिन्न विश्वविद्यालयों में दर्शन के पाठ्यक्रम और शैवदर्शन की शाक्त और तन्त्र से यत्किञ्चित सम्बद्धता भी है।
 आचार्य अभिनवगुप्त के व्यक्तित्व का प्रमुख आयाम है कि वे एक शैवाचार्य थे। काश्मीर-शैव-दार्शनिक सिद्धान्तों पर उन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया। आचार्य अभिनव ने तन्त्रालोक, तन्त्रसार, मालिनीविजयवार्त्तिक, परमार्थसार, परमार्थचर्चा आदि ग्रन्थों की रचना की इसके अतिरिक्त ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी, ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी एवं भगवद्गीतार्थसंग्रह आदि उनके द्वारा प्रणीत प्रसिद्ध टीकायें हैं। उन्होंने काश्मीर शैव के मूल तत्त्वों शिव एवं शक्ति के स्तुति व आराधना हेतु स्तोत्रों की रचना भी की है जिनमें क्रमस्तोत्र, भैरवस्तोत्र, अनुत्तराष्टिका, अनुभवनिवेदनस्तोत्र, देहस्थदेवताचक्रस्तोत्र आदि प्रमुख हैं।
यह हमारे लिये सौभाग्य का विषय है कि अन्य अनेक संस्कृत आचार्यों की भाँति आचार्य अभिनवगुप्त के स्थितिकाल के विषय में हमें अँधेरे में नहीं रहना पड़ा है। आचार्य का स्थितिकाल निश्चित करना सम्भव हुआ है। उनका समय ज्ञात है क्योंकि उन्होंने स्वयं कहा है कि ’ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ पर उनकी ’बृहतीवृत्ति’ 1015 ई. में रची गयी और ’क्रमस्तोत्र’ एवं भिरव-स्तोत्र की रचना क्रमशः 990-991 ई. व 992-993 ई. में हुयी ।[1]
इस वर्ष भारतीय संस्कृति के सुधीजनों, प्रमुख धर्माचार्यों, साहित्यकारों, साहित्यशास्त्रियों, काश्मीर-परम्परा के विशेषज्ञों और भारत के सिरमौर कश्मीर की विद्वत्परम्परा के प्रति जिज्ञासु चिन्तकों द्वारा आचार्य अभिनवगुप्त सहस्त्राब्दी वर्ष के आयोजन का संकल्प लिया गया है। वर्षपर्यन्त देशभर में चलने वाले इस आयोजन से विद्वत्जन, विद्यार्थी, युवा, समाज, व पूरा देश आचार्य अभिनवगुप्त के माध्यम से कश्मीर के पुरातन वैभव को समझेगा, जानेगा और विचार करेगा। इसके माध्यम से सौन्दर्य और देवों की नगरी कश्मीर की ज्ञानराशि का उद्घाटन होगा। वर्तमान में बारूद और अलगाववाद के आतंकी मंसूबों से कश्मीर को सुलगा रहे आततायी भी बेनकाब होंगे।




[1] संस्कृत काव्यशास्त्र का इतिहास, सुशील कुमार डे, पृ. 94

1 comment:

PRATEEK MALI said...

शुक्रिया दीदी..