Wednesday, February 16, 2011

परिवार और समाज

परिवार समाज का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। परिवार से ही समाज बनता है। अतः परिवार की संरचना में परिवर्तन होंने से समाजिक संरचना में परिवर्तन होना अवश्यंभावी है। औद्योगिक क्रान्ति के बाद जब पश्चिम में सामाजिक बदलाव आया तो उसका कारण पारिवारिक संरचना में बदलाव ही था। या यों कहें कि पश्चिम की औद्योगिक क्रान्ति एवं सामाजिक परिवर्तन का मूल पारिवारिक संरचना में परिवर्तन ही था जिसके तहत औरतें घर क बाहर काम के लिये निकलने लगीं और उन्होंने अपने परम्परागत वस्त्र त्यागकर कार्यस्थल के उपयुक्त वस्त्र का चुनाव किया। अनेक प्रकार के संघर्षों मे पाश्चात्य जगत् में जब पुरुषों की जनसंख्या कम हुई तो परिवार का सारा दायित्व महिलाओं पर आ गया, इस प्रकार पारिवारिक संरचना में व्यापक परिवर्तन हुआ।

स्वतन्त्रता के समय से ही भारत में पारिवारिक अलगाववाद, एकल परिवार की प्रवृत्ति दिखने लगी थी, पर जैसे-जैसे दिन बीतता गया यह प्रवृत्ति समाज में बढ़ती ही गयी। और आज स्थिति यह है कि संयुक्त परिवार जिसमें तीन पीढ़ियाँ एक साथ रहती थीं, अब इतिहास का विषय बन चुका है। वर्तमान समाज में जन्म लेने वाले बच्चे अब यदि कहें किसी किताब में दादी-नानी की कहानियाँ पढ़कर प्रश्न पूछ बैठे कि दादी-नानी की कहानियाँ कैसे? तो कोई महान् आश्चर्य की बात न होगी।